भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3017

सध्वजाः सपताकाश्च सघण्टाः सपरश्वधाः ॥ २९ ॥ उनकी पीठोंपर तरकस बँधे थे। वे विचित्र बाण लिये युद्धके लिये उन्मत्त जान पड़ते थे। उनके पास ध्वजा, पताका, घंटे और फरसे मौजूद थे ॥ २९ ॥

महापाशोद्यतकरास्तथा लगुडपाणयः । स्थूणाहस्ताः खड्गहस्ताः सर्पोच्छितकिरीटिनः ॥ ३० ॥ उन्होंने अपने हाथोंमें बड़े-बड़े पाश उठा रखे थे, कितनोंके हाथोंमें डंडे, खम्भे और खड्ग शोभा पाते थे तथा कितनोंके मस्तकपर सर्पोंके उन्नत किरीट सुशोभित होते थे ॥ ३० ॥

महासर्पाङ्गदधराश्चित्राभरणधारिणः । रजोध्वस्ताः पङ्कदिग्धाः सर्वे शुक्लाम्वरस्रजः ॥ ३१ ॥ कितनोंने बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प धारण कर रखे थे। कितने ही विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थे, बहुतोंके शरीर धूलि-धूसर हो रहे थे। कितने ही अपने अंगोंमें कीचड़ लपेटे हुए थे। उन सबने श्वेत वस्त्र और श्वेत फूलोंकी माला धारण कर रखी थी ॥

नीलाङ्गाः पिङ्गलाङ्गाश्च मुण्डवक्त्रास्तथैव च । भेरीशङ्खमृदङ्गांश्च झर्झरानकगोमुखान् ॥ ३२ ॥ अवादयन् पारिषदाः प्रहृष्टाः कनकप्रभाः । गायमानास्तथैवान्ये नृत्यमानास्तथा परे ॥ ३३ ॥ कितनोंके अंग नील और पिंगलवर्णके थे। कितनोंने अपने मस्तकके बाल मुँड़वा दिये। कितने ही सुनहरी प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। वे सभी पार्षद हर्षसे उत्फुल्ल हो भेरी, शंख, मृदंग, झाँझ, ढोल और गोमुख बजा रहे थे। कितने ही गीत गा रहे थे और दूसरे बहुत-से पार्षद नाच रहे थे ॥ ३२-३३ ॥

लङ्घन्तः प्लवन्तश्च वल्गन्तश्च महारथाः । धावन्तो जवना मुण्डाः पवनोद्धूतमूर्धजाः ॥ ३४ ॥ वे महारथी भूतगण उछलते, कूदते और लाँघते हुए बड़े वेगसे दौड़ रहे थे। उनमेंसे कितने तो माथ मुँड़ाये हुए थे और कितनोंके सिरके बाल हवाके झोंकेसे ऊपरकी ओर उठ गये थे ॥ ३४ ॥

मत्ता इव महानागा विनदन्तो मुहुर्मुहुः । सुभीमा घोररूपाश्च शूलपट्टिशपाणयः ॥ ३५ ॥ वे मतवाले गजराजोंके समान बारंबार गर्जना करते थे। उनके हाथोंमें शूल और पट्टिश दिखायी देते थे। वे घोर रूपधारी और भयंकर थे ॥ ३५ ॥

नानाविरागवसनाश्चित्रमाल्यानुलेपनाः । रत्नचित्राङ्गदधराः समुद्यतकरास्तथा ॥ ३६ ॥