भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3021

गुणानां हि प्रधानानामेकत्वं त्वयि तिष्ठति ॥ ५८ ॥ प्रभो! सम्पूर्ण भूत आपमें स्थित हैं और आप सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित हैं। आपमें ही मुख्य-मुख्य गुणोंकी एकता होती है ॥ ५८ ॥ सर्वभूताश्रय विभो हविर्भूतमवस्थितम् । प्रतिगृहाण मां देव यद्यशक्याः परे मया ॥ ५९ ॥ विभो! आप सम्पूर्ण भूतोंके आश्रय हैं। देव! यदि शत्रुओंका मेरे द्वारा पराभव नहीं हो सकता तो आप हविष्यरूपमें सामने खड़े हुए मुझ अश्वत्थामाको स्वीकार कीजिये ॥ ५९ ॥ इत्युक्त्वा द्रौणिरास्थाय तां वेदीं दीप्तपावकाम् । संत्यज्यात्मानमारुह्य कृष्णवर्त्मन्युपाविशत् ॥ ६० ॥ ऐसा कहकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा प्रज्वलित अग्निसे प्रकाशित हुई उस वेदीपर चढ़ गया और प्राणोंका मोह छोड़कर आगके बीचमें बैठ गया ॥ ६० ॥ तमूर्ध्वबाहुं निश्चेष्टं दृष्ट्वा हविरुपस्थितम् । अब्रवीद् भगवान् साक्षान्महादेवो हसन्निव ॥ ६१ ॥ उसे हविष्यरूपसे दोनों बाँहें ऊपर उठाये निश्चेष्ट भावसे बैठे देख साक्षात् भगवान् महादेवने हँसते हुए-से कहा— ॥ ६१ ॥ सत्यशौचार्जवत्यागैस्तपसा नियमेन च । क्षान्त्या भक्त्या च धृत्या च बुद्ध्या च वचसा तथा ॥ ६२ ॥ यथावदहमाराद्धः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा । तस्मादिष्टतमः कृष्णादन्यो मम न विद्यते ॥ ६३ ॥ 'अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने सत्य, शौच, सरलता, त्याग, तपस्या, नियम, क्षमा, भक्ति, धैर्य, बुद्धि और वाणीके द्वारा मेरी यथोचित आराधना की है; अतः श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा कोई मुझे परम प्रिय नहीं है ॥ ६२-६३ ॥ कुर्वता तात सम्मानं त्वां च जिज्ञासता मया । पञ्चालाः सहसा गुप्ता मायाश्च बहुशः कृताः ॥ ६४ ॥ 'तात! उन्हींका सम्मान और तुम्हारी परीक्षा करनेके लिये मैंने पांचालोंकी सहसा रक्षा की है और बारंबार मायाओंका प्रयोग किया है ॥ ६४ ॥ कृतस्तस्यैव सम्मानः पञ्चालान् रक्षता मया । अभिभूतास्तु कालेन नैषामद्यास्ति जीवितम् ॥ ६५ ॥ 'पांचालोंकी रक्षा करके मैंने श्रीकृष्णका ही सम्मान किया है; परंतु अब वे कालसे पराजित हो गये हैं, अब इनका जीवन शेष नहीं है' ॥ ६५ ॥ एवमुक्त्वा महात्मानं भगवानात्मनस्तनुम् । आविवेश ददौ चास्मै विमलं खड्गमुत्तमम् ॥ ६६ ॥