भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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सप्तदशोऽध्यायः

अपने समस्त पुत्रों और सैनिकोंके मारे जानेके विषयमें युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे पूछना और उत्तरमें श्रीकृष्णके द्वारा महादेवजीकी महिमाका प्रतिपादन

वैशम्पायन उवाच

हतेषु सर्वसैन्येषु सौप्तिके तै रथेस्त्रिभिः ।
शोचन् युधिष्ठिरो राजा दाशार्हमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! रातको सोते समय उन तीन महारथियोंने पाण्डवोंकी सारी सेनाओंका जो संहार कर डाला था, उसके लिये शोक करते हुए राजा युधिष्ठिरने दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

कथं नु कृष्ण पापेन क्षुद्रेणाकृतकर्मणा ।
द्रौणिना निहताः सर्वे मम पुत्रा महारथाः ॥ २ ॥
‘श्रीकृष्ण! नीच एवं पापात्मा द्रोणकुमारने कोई विशेष तप या पुण्यकर्म भी तो नहीं किया था, जिससे उसमें अलौकिक शक्ति आ जाती। फिर उसने मेरे सभी महारथी पुत्रोंका वध कैसे कर डाला? ॥ २ ॥

तथा कृतास्त्रविक्रान्ताः सहस्रशतयोधिनः ।
द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रोणपुत्रेण पातिताः ॥ ३ ॥
‘द्रुपदके पुत्र तो अस्त्र-विद्याके पूरे पण्डित, पराक्रमी तथा लाखों योद्धाओंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ थे तो भी द्रोणपुत्रने उन्हें मार गिराया, यह कितने आश्चर्यकी बात है? ॥ ३ ॥

यस्य द्रोणो महेष्वासो न प्रादादाहवे मुखम् ।
निजघ्ने रथिनां श्रेष्ठं धृष्टद्युम्नं कथं नु सः ॥ ४ ॥
‘महाधनुर्धर द्रोणाचार्य युद्धमें जिसके सामने मुँह नहीं दिखाते थे, उसी रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्नको अश्वत्थामाने कैसे मार डाला? ॥ ४ ॥

किं नु तेन कृतं कर्म तथायुक्तं नरर्षभ ।
यदेकः समरे सर्वानवधीन्नो गुरोः सुतः ॥ ५ ॥
‘नरश्रेष्ठ! आचार्यपुत्रने ऐसा कौन-सा उपयुक्त कर्म किया था, जिससे उसने अकेले ही समरांगणमें हमारे सभी सैनिकोंका वध कर डाला’ ॥ ५ ॥

श्रीभगवानुवाच

नूनं स देवदेवानामीश्वरेश्वरमव्ययम् ।
जगाम शरणं द्रौणिरेकस्तेनावधीद् बहून् ॥ ६ ॥