महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः
संसाररूपी वनके रूपकका स्पष्टीकरण
धृतराष्ट्र उवाच
अहो खलु महद् दुःखं कृच्छ्रवासश्च तस्य ह ।
कथं तस्य रतिस्तत्र तुष्टिर्वा वदतां वर ।। १ ।।
**धृतराष्ट्र बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ विदुर! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! उस ब्राह्मणको तो महान् दुःख प्राप्त हुआ था। वह बड़े कष्टसे वहाँ रह रहा था तो भी वहाँ कैसे उसका मन लगता था और कैसे उसे संतोष होता था? ।। १ ।।
स देशः क्व नु यत्रासौ वसते धर्मसंकटे ।
कथं वा स विमुच्येत नरस्तस्मान्महाभयात् ।। २ ।।
कहाँ है वह देश, जहाँ बेचारा ब्राह्मण ऐसे धर्मसंकटमें रहता है? उस महान् भयसे उसका छुटकारा किस प्रकार हो सकता है? ।। २ ।।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व साधु चेष्टामहे तदा ।
कृपा मे महती जाता तस्याभ्युद्धरणेन हि ।। ३ ।।
यह सब मुझे बताओ; फिर हम सब लोग उसे वहाँसे निकालनेकी पूरी चेष्टा करेंगे। उसके उद्धारके लिये मुझे बड़ी दया आ रही है ।। ३ ।।
विदुर उवाच
उपमानमिदं राजन् मोक्षविद्भिरुदाहृतम् ।
सुकृतं विन्दते येन परलोकेषु मानवः ।। ४ ।।
**विदुरजीने कहा—**राजन्! मोक्षतत्त्वके विद्वानोंद्वारा बताया गया यह एक दृष्टान्त है, जिसे समझकर वैराग्य धारण करनेसे मनुष्य परलोकमें पुण्यका फल पाता है ।।
उच्यते यत् तु कान्तारं महासंसार एव सः ।
वन दुर्गं हि यच्चैतत् संसारगहनं हि तत् ।। ५ ।।
जिसे दुर्गम स्थान बताया गया है, वह महासंसार ही है और जो यह दुर्गम वन कहा गया है, यह संसारका ही गहन स्वरूप है ।। ५ ।।
ये च ते कथिता व्याला व्याधयस्ते प्रकीर्तिताः ।
या सा नारी बृहत्काया अध्यतिष्ठत तत्र वै ।। ६ ।।
तामाहुस्तु जरां प्राज्ञा रूपवर्णविनाशिनीम् ।