महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3208, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशत्रुओंकी सेनाको दग्ध करते समय जिनकी गति अग्निके समान होती थी, वे ही बुझी हुई लपटोंवाली आगके समान मरकर पृथ्वीपर पड़े हैं ।। ३० ।। धनुर्मुष्टिरशीर्णाश्च हस्तावापश्च माधव । द्रोणस्य निहतस्याजौ दृश्यते जीवतो यथा ।। ३१ ।। माधव! युद्धमें मारे जानेपर भी द्रोणाचार्यके धनुषके साथ जुड़ी हुई मुट्ठी ढीली नहीं हुई है। दस्ताना भी ज्यों-का-त्यों दिखायी देता है, मानो वह जीवित पुरुषके हाथमें हो ।। ३१ ।। वेदा यस्माच्च चत्वारः सर्वाण्यस्त्राणि केशव । अनपेतानि वै शूराद् यथैवादौ प्रजापतेः ।। ३२ ।। वन्दनार्हाविमौ तस्य बन्दिभिर्वन्दितौ शुभौ । गोमायवो विकर्षन्ति पादौ शिष्यशतार्चितौ ।। ३३ ।। केशव! जैसे पूर्वकालसे ही प्रजापति ब्रह्मासे वेद कभी अलग नहीं हुए, उसी प्रकार जिन शूरवीर द्रोणसे चारों वेद और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र कभी दूर नहीं हुए, उन्हींके बन्दीजनोंद्वारा वन्दित इन दोनों सुन्दर एवं वन्दनीय चरणारविन्दोंको जिनकी सैकड़ों शिष्य पूजा कर चुके हैं, गीदड़ घसीट रहे हैं ।। ३२-३३ ।। द्रोणं द्रुपदपुत्रेण निहतं मधुसूदन । कृपी कृपणमन्वास्ते दुःखोपहतचेतना ।। ३४ ।। मधुसूदन! द्रुपदपुत्रके द्वारा मारे गये द्रोणाचार्यके पास उनकी पत्नी कृपी बड़े दीनभावसे बैठी है। दुःखसे उसकी चेतना लुप्त-सी हो गयी है ।। ३४ ।। तां पश्य रुदतीमार्ता मुक्तकेशीमधोमुखीम् । हतं पतिमुपासन्तीं द्रोणं शस्त्रभृतां वरम् ।। ३५ ।। देखो, कृपी केश खोले नीचे मुँह किये रोती हुई अपने मारे गये पति शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यकी उपासना कर रही है ।। ३५ ।। बाणैर्भिन्नतनुत्राणं धृष्टद्युम्नेन केशव । उपास्ते वै मृधे द्रोणं जटिला ब्रह्मचारिणी ।। ३६ ।। केशव! धृष्टद्युम्नने अपने बाणोंसे जिन आचार्य द्रोणका कवच छिन्न-भिन्न कर दिया है, उन्हींके पास युद्धस्थलमें वह जटाधारिणी ब्रह्मचारिणी कृपी बैठी हुई है ।। ३६ ।। प्रेतकृत्यं च यतते कृपी कृपणमातुरा । हतस्य समरे भर्तुः सुकुमारी यशस्विनी ।। ३७ ।। शोकसे दीन और आतुर हुई यशस्विनी सुकुमारी कृपी समरमें मारे गये पतिदेवका प्रेतकर्म करनेकी चेष्टा कर रही है ।। ३७ ।। अग्नीनाधाय विधिवच्चितां प्रज्वाल्य सर्वतः । द्रोणमाधाय गायन्ति त्रीणि सामानि सामगाः ।। ३८ ।।