भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3216

मधुसूदन! देखो, पास ही वह शूरवीर कलिंगराज सो रहा है, जिसकी दोनों विशाल भुजाओंमें चमकीले अंगद (बाजूबन्द) बँधे हुए हैं ॥ ६ ॥ मागधानामधिपतिं जयत्सेनं जनार्दन । आवार्य सर्वतः पत्न्यः प्ररुदत्यः सुविह्वलाः ॥ ७ ॥ जनार्दन! उधर मगधराज जयत्सेन पड़ा है, जिसे चारों ओरसे घेरकर उसकी पत्नियाँ अत्यन्त व्याकुल हो फूट-फूटकर रो रही हैं ॥ ७ ॥ आसामायतनेत्राणां सुस्वराणां जनार्दन । मनःश्रुतिहरो नादो मनो मोहयतीव मे ॥ ८ ॥ श्रीकृष्ण! मधुर स्वरवाली इन विशाललोचना रानियोंका मन और कानोंको मोह लेनेवाला आर्तनाद मेरे मनको मूर्च्छित-सा किये देता है ॥ ८ ॥ प्रकीर्णवस्त्राभरणा रुदत्यः शोककर्शिताः । स्वास्तीर्णशयनोपेता मागध्यः शेरते भुवि ॥ ९ ॥ इनके वस्त्र और आभूषण अस्त-व्यस्त हो रहे हैं। सुन्दर बिछौनोंसे युक्त शय्याओंपर शयन करनेके योग्य ये मगधदेशकी रानियाँ शोकसे व्याकुल हो रोती हुई भूमिपर लोट रही हैं ॥ ९ ॥ कोसलानामधिपतिं राजपुत्रं बृहद्बलम् । भर्तारं परिवार्यैताः पृथक् प्ररुदिताः स्त्रियः ॥ १० ॥ अपने पति कोसलनरेश राजकुमार बृहद्बलको भी चारों ओरसे घेरकर उनकी रानियाँ अलग-अलग रो रही हैं ॥ अस्य गात्रगतान् बाणान् कार्ष्णिबाहुबलार्पितान् । उद्धरन्त्यसुखाविष्टा मूर्च्छमानाः पुनः पुनः ॥ ११ ॥ अभिमन्युके बाहुबलसे प्रेरित होकर कोसल-नरेशके अंगोंमें धँसे हुए बाणोंको ये रानियाँ अत्यन्त दुःखी होकर निकालती हैं और बारंबार मूर्च्छित हो जाती हैं ॥ ११ ॥ आसां सर्वानवद्यानामातपेन परिश्रमात् । प्रम्लाननलिनाभानि भान्ति वक्त्राणि माधव ॥ १२ ॥ माधव! इन सर्वांगसुन्दरी राजमहिलाओंके सुन्दर मुख धूप और परिश्रमके कारण मुरझाये हुए कमलोंके समान प्रतीत होते हैं ॥ १२ ॥ द्रोणेन निहताः शूराः शेरते रुचिराङ्गदाः । धृष्टद्युम्नसुताः सर्वे शिशवो हेममालिनः ॥ १३ ॥ ये द्रोणाचार्यके मारे हुए धृष्टद्युम्नके सभी छोटे-छोटे शूरवीर बालक सो रहे हैं। इनकी भुजाओंमें सुन्दर अंगद और गलेमें सोनेके हार शोभा पाते हैं ॥ १३ ॥ रथाग्न्यगारं चापार्चिःशरशक्तिगदेन्धनम् । द्रोणमासाद्य निर्दग्धाः शलभा इव पावकम् ॥ १४ ॥