भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423

वे सभी कन्याएँ रथोंमें बैठी थीं। उन सभी रथोंमें चार-चार घोड़े जुते थे। प्रत्येक रथके पीछे सोनेके हारोंसे अलंकृत सौ-सौ हाथी चलते थे ।। ३ ।। सहस्रमश्वाश्चैकैकं गजानां पृष्ठतोऽन्वयुः । अश्वे अश्वे शतं गावो गवां पश्चादजाविकम् ।। ४ ।। एक-एक हाथीके पीछे हजार-हजार घोड़े जा रहे थे और एक-एक घोड़ेके साथ सौ-सौ गौएँ एवं गौओंके पीछे भेड़ और बकरियोंके झुंड चलते थे ।। ४ ।। तेनाक्रान्ता जलौघेन दक्षिणा भूयसीर्ददत् । उपह्वरेऽतिव्यथिता तस्याङ्के निषसाद ह ।। ५ ।। राजा भगीरथ गंगाके तटपर भूयसी (प्रचुर) दक्षिणा देते हुए निवास करते थे। अतः उनके संकल्पकालिक जलप्रवाहसे आक्रान्त होकर गंगादेवी मानो अत्यन्त व्यथित हो उठीं और समीपवर्ती राजाके अंकमें आ बैठीं ।। ५ ।। तथा भागीरथी गङ्गा उर्वशी चाभवत् पुरा । दुहितृत्वं गता राज्ञः पुत्रत्वमगमत् तदा ।। ६ ।। इस प्रकार भगीरथकी पुत्री होनेसे गंगाजी भागीरथी कहलायीं और उनके ऊरुपर बैठनेके कारण उर्वशी नामसे प्रसिद्ध हुईं। राजाके पुत्रीभावको प्राप्त होकर उनका नरकसे त्राण करनेके कारण वे उस समय पुत्रभावको भी प्राप्त हुईं ।। ६ ।। तां तु गाथां जगुः प्रीता गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः । पितृदेवमनुष्याणां शृण्वतां वल्गुवादिनः ।। ७ ।। सूर्यके समान तेजस्वी और मधुरभाषी गन्धर्वोंने प्रसन्न होकर देवताओं, पितरों और मनुष्योंके सुनते हुए यह गाथा गायी थी ।। ७ ।। भगीरथं यजमानमैक्ष्वाकं भूरिदक्षिणम् ।