महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 450, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनःशिला इव शिलाः संयुक्ता जतुराशिभिः ॥ ३ ॥ वे अत्यन्त भयंकर और क्रूर स्वभाववाले व्याघ्रोंका दमन करके उन्हें अपने वशमें कर लेते थे। मैनसिलके समान पीली और लाक्षाराशिसे संयुक्त लाल रंगकी बड़ी-बड़ी शिलाओंको वे सुगमतापूर्वक हाथसे उठा लेते थे ॥ ३ ॥
व्यालादींश्चातिबलवान् सुप्रतीकान् गजानपि । दंष्ट्रासु गृह्य विमुखान् शुष्कास्यानकरोद् वशे ॥ ४ ॥ अत्यन्त बलवान् भरत सर्प आदि जन्तुओंको और सुप्रतीक जातिके गजराजोंके भी दाँत पकड़ लेते और उनके मुख सुखाकर उन्हें विमुख करके अपने अधीन कर लेते थे ॥ ४ ॥
महिषानप्यतिबलो बलिनो विचकर्ष ह । सिंहानां च सुदृप्तानां शतान्याकर्षयद् बलात् ॥ ५ ॥ भरतका बल असीम था। वे बलवान् भैंसों और सौ-सौ गर्वीले सिंहोंको भी बलपूर्वक घसीट लाते थे ॥ ५ ॥
बलिनः सृमरान् खड्गान् नानासत्त्वानि चाप्युत । कृच्छ्रप्राणं वने बद्ध्वा दमयित्वाप्यवासृजत् ॥ ६ ॥ बलवान् सामरों, गैंडों तथा अन्य नाना प्रकारके हिंसक जन्तुओंको वे वनमें बाँध लेते और उनका दमन करते-करते उन्हें अधमरा करके छोड़ते थे ॥ ६ ॥
तं सर्वदमनेत्याहुर्द्विजास्तेनास्य कर्मणा । तं प्रत्यषेधज्जननी मा सत्त्वानि विजीजहि ॥ ७ ॥ उनके इस कर्मसे ब्राह्मणोंने उनका नाम सर्वदमन रख दिया। माता शकुन्तलाने भरतको मना किया कि तू जंगली जीवोंको सताया न कर ॥ ७ ॥
सोऽश्वमेधशतेनेष्ट्वा यमुनामनु वीर्यवान् । त्रिशताश्वान् सरस्वत्यां गङ्गामनु चतुःशतान् ॥ ८ ॥ सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च । पुनरीजे महायज्ञैः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ ९ ॥ पराक्रमी महाराज भरत जब बड़े हुए, तब उन्होंने यमुनाके तटपर सौ, सरस्वतीके तटपर तीन सौ और गङ्गाजीके किनारे चार सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करके पुनः उत्तम दक्षिणाओंसे सम्पन्न एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय महायज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन किया ॥ ८-९ ॥
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यामिष्ट्वा विश्वजिता अपि । वाजपेयसहस्राणां सहस्रैश्च सुसंवृतैः ॥ १० ॥ इष्ट्वा शाकुन्तलो राजा तर्पयित्वा द्विजान् धनैः । सहस्रं यत्र पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ ॥ ११ ॥