भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 451

जाम्बूनदस्य शुद्धस्य कनकस्य महायशाः । इसके बाद भरतने अग्निष्टोम और अतिरात्र याग करके विश्वजित् नामक यज्ञ किया। तत्पश्चात् सर्वथा सुरक्षित दस लाख वाजपेय यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करके महायशस्वी शकुन्तलाकुमार राजा भरतने धनद्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करते हुए आचार्य कण्वको विशुद्ध जम्बूनद सुवर्णके बने हुए एक हजार कमल भेंट किये ।। १०-११ १/२ ।।

यस्य यूपः शतव्यामः परिणाहेन काञ्चनः ।। १२ ।। समागम्य द्विजैः सार्धं सेन्द्रैर्देवैः समुच्छ्रितः । इन्द्र आदि देवताओंने वहाँ ब्राह्मणोंके साथ मिलकर राजा भरतके यज्ञमें सोनेके बने हुए सौ व्याम (चार सौ हाथ) लंबे सुवर्णमय यूपका आरोपण किया ।। १२ १/२ ।।

अलंकृतान् राजमानान् सर्वरत्नैर्मनोहरैः ।। १३ ।। हैरण्यानश्वान् द्विरदान् रथानुष्ट्रानजाविकम् । दासीदासं धनं धान्यं गाः सवत्साः पयस्विनीः ।। १४ ।। ग्रामान् गृहांश्च क्षेत्राणि विविधांश्च परिच्छदान् । कोटीशतायुतांश्चैव ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ।। १५ ।। चक्रवर्ती ह्यदीनात्मा जितारिर्ह्यजितः परैः । शत्रुविजयी, दूसरोंसे पराजित न होनेवाले अदीनचित्त चक्रवर्ती सम्राट् भरतने ब्राह्मणोंको सम्पूर्ण मनोहर रत्नोंसे विभूषित, कान्तिमान् एवं सुवर्णशोभित घोड़े, हाथी, रथ, ऊँट, बकरी, भेड़, दास, दासी, धन-धान्य, दूध देनेवाली सवत्सा गायें, गाँव, घर, खेत तथा वस्त्राभूषण आदि नाना प्रकारकी सामग्री एवं दस लाख कोटि स्वर्णमुद्राएँ दी थीं ।। १३—१५ १/२ ।।

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।। १६ ।। पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ।। १७ ।। श्वैत्य संजय! चारों कल्याणकारी गुणोंमें वे तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मृत्युसे बच न सके, तब दूसरे कैसे बच सकते हैं? अतः तुम यज्ञ और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। ऐसा नारदजीने कहा ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये अष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।।

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