महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 491, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुःसप्ततितमोऽध्यायः
जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना
संजय उवाच
श्रुत्वा तु तं महाशब्दं पाण्डूनां जयगृद्धिनाम् ।
चारैः प्रवेदिते तत्र समुत्थाय जयद्रथः ॥ १ ॥
शोकसम्मूढहृदयो दुःखेनाभिपरिप्लुतः ।
मज्जमान इवागाधे विपुले शोकसागरे ॥ २ ॥
जगाम समितिं राज्ञां सैन्धवो विमृशन् बहु ।
स तेषां नरदेवानां सकाशे पर्यदेवयत् ॥ ३ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! सिंधुराज जयद्रथने जब विजयाभिलाषी पाण्डवोंका वह महान् शब्द सुना और गुप्तचरोंने आकर जब अर्जुनकी प्रतिज्ञाका समाचार निवेदन किया, तब वह सहसा उठकर खड़ा हो गया, उसका हृदय शोकसे व्याकुल हो गया। वह दुःखसे व्याप्त हो शोकके विशाल एवं अगाध महासागरमें डूबता हुआ-सा बहुत सोच-विचारकर राजाओंकी सभामें गया और उन नरदेवोंके समीप रोने-बिलखने लगा ॥ १—३ ॥
अभिमन्योः पितुर्भीतः सव्रीडो वाक्यमब्रवीत् ।
योऽसौ पाण्डोः किल क्षेत्रे जातः शक्रेण कामिना ॥ ४ ॥
स निनीषति दुर्बुद्धिर्मां किलैकं यमक्षयम् ।
तत् स्वस्ति वोऽस्तु यास्यामि स्वगृहं जीवितेप्सया ॥ ५ ॥
जयद्रथ अभिमन्युके पितासे बहुत डर गया था, इसलिये लज्जित होकर बोला—‘राजाओ! कामी इन्द्रने पाण्डुकी पत्नीके गर्भसे जिसको जन्म दिया है, वह दुर्बुद्धि अर्जुन केवल मुझको ही यमलोक भेजना चाहता है; यह बात सुननेमें आयी है। अतः आपलोगोंका कल्याण हो। अब मैं अपने प्राण बचानेकी इच्छासे अपनी राजधानीको चला जाऊँगा ॥ ४-५ ॥
अथवास्त्रप्रतिबलास्त्रात मां क्षत्रियर्षभाः ।
पार्थेन प्रार्थितं वीरास्ते संदत्त ममाभयम् ॥ ६ ॥
‘अथवा क्षत्रियशिरोमणि वीरो! आपलोग अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें अर्जुनके समान ही शक्तिशाली हैं। उधर अर्जुनने मेरे प्राण लेनेकी प्रतिज्ञा की है। इस अवस्थामें आप मेरी रक्षा करें और मुझे अभयदान दें ॥ ६ ॥
द्रोणदुर्योधनकृपाः कर्णमद्रेशबाह्लिकाः ।