भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 520

धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण सर्वं तस्मै निवेदितम् । स हत्वा सैन्धवं संख्ये पुनरेतु धनंजयः ॥ १५ ॥ धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने जयद्रथको सब बातें बता दी होंगी। अर्जुन युद्धमें सिंधुराज जयद्रथको मारकर पुनः सकुशल लौट आवें (यही हमारी शुभ कामना है) ॥ १५ ॥

जित्वा रिपुगणांश्चैव पारयत्वर्जुनो व्रतम् । श्वोऽहत्वा सिन्धुराजं वै धूमकेतुं प्रवेक्ष्यति ॥ १६ ॥ न ह्यसावनृतं कर्तुमलं पार्थो धनंजयः । धर्मपुत्रः कथं राजा भविष्यति मृतेऽर्जुने ॥ १७ ॥ अर्जुन शत्रुओंको जीतकर अपना व्रत पूरा करें। यदि वे कल सिंधुराजको न मार सके तो अग्निमें प्रवेश कर जायेंगे। कुन्तीकुमार धनंजय अपनी बात झूठी नहीं कर सकते। यदि अर्जुन मर गये तो धर्मपुत्र युधिष्ठिर कैसे राजा होंगे? ॥ १६-१७ ॥

तस्मिन् हि विजयः कृत्स्नः पाण्डवेन समाहितः । यदि नोऽस्ति कृतं किञ्चिद् यदि दत्तं हुतं यदि ॥ १८ ॥ फलेन तस्य सर्वस्य सव्यसाची जयत्वरीन् । पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अर्जुनपर ही सारा विजयका भार रख दिया। यदि हमलोगोंका किया हुआ कुछ भी सत्कर्म शेष हो, यदि हमने दान और होम किये हों तो हमारे उन सभी शुभकर्मोंके फलसे सव्यसाची अर्जुन अपने शत्रुओंपर विजय प्राप्त करें ॥ १८ १/२ ॥

एवं कथयतां तेषां जयमाशंसतां प्रभो ॥ १९ ॥ कृच्छ्रेण महता राजन् रजनी व्यत्यवर्तत । राजन्! प्रभो! इस प्रकार बातें करते और अर्जुनकी विजय चाहते हुए उन सभी सैनिकोंकी वह रात्रि महान् कष्टसे बीती थी ॥ १९ १/२ ॥

तस्यां रजन्यां मध्ये तु प्रतिबुद्धो जनार्दनः ॥ २० ॥ स्मृत्वा प्रतिज्ञां पार्थस्य दारुकं प्रत्यभाषत । भगवान् श्रीकृष्ण उस रात्रिके मध्यकालमें जाग उठे और अर्जुनकी प्रतिज्ञाको स्मरण करके दारुकसे बोले— ॥ २० १/२ ॥

अर्जुनेन प्रतिज्ञातमार्तेन हतबन्धुना ॥ २१ ॥ जयद्रथं वधिष्यामि श्वोभूत इति दारुक । ‘दारुक! अपने पुत्र अभिमन्युके मारे जानेसे शोकार्त होकर अर्जुनने यह प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं कल जयद्रथका वध कर डालूँगा' ॥ २१ १/२ ॥

तत्तु दुर्योधनः श्रुत्वा मन्त्रिभिर्मन्त्रयिष्यति ॥ २२ ॥ यथा जयद्रथं पार्थो न हन्यादिति संयुगे ।

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