महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 642, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नने मनुष्योंके बहुत-से मस्तक काट गिराये, जो चारों ओर नष्ट होकर पड़े हुए कमलवनोंके समान जान पड़ते थे ॥ ७ ॥ विनिकीर्णानि वीराणामनीकेषु समन्ततः । वस्त्राभरणशस्त्राणि ध्वजवर्मायुधानि च ॥ ८ ॥ चारों ओर सेनाओंमें वीरोंके बहुत-से वस्त्र, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र, ध्वज, कवच तथा आयुध छिन्न-भिन्न होकर बिखरे पड़े थे ॥ ८ ॥ तपनीयतनुत्राणाः संसिक्ता रुधिरेण च । संसक्ता इव दृश्यन्ते मेघसंघाः सविद्युतः ॥ ९ ॥ सुवर्णका कवच बाँधे तथा खूनसे लथपथ हुए सैनिक परस्पर सटे हुए बिजलियोंसहित मेघसमूहोंके समान दिखायी देते थे ॥ ९ ॥ कुञ्जराश्वनरानन्ये पातयन्ति स्म पत्रिभिः । तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महारथाः ॥ १० ॥ बहुत-से दूसरे महारथी चार हाथके धनुष खींचते हुए अपने पंखयुक्त बाणोंद्वारा हाथी, घोड़े और पैदल मनुष्योंको मार गिराते थे ॥ १० ॥ असिचर्माणि चापानि शिरांसि कवचानि च । विप्रकीर्यन्त शूराणां सम्प्रहारे महात्मनाम् ॥ ११ ॥ उन महामनस्वी वीरोंके संग्राममें योद्धाओंके खड्ग, ढाल, धनुष, मस्तक और कवच कटकर इधर-उधर बिखरे जाते थे ॥ ११ ॥ उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः । अदृश्यन्त महाराज तस्मिन् परमसंकुले ॥ १२ ॥ महाराज! उस महाभयानक युद्धमें चारों ओर असंख्य कबन्ध खड़े दिखायी देते थे ॥ १२ ॥ गृध्राः कङ्का बकाः श्येना वायसा जम्बुकास्तथा । बहुशः पिशिताशाश्च तत्रादृश्यन्त मारिष ॥ १३ ॥ आर्य! वहाँ बहुत-से गीध, कंक, बगले, बाज, कौए, सियार तथा अन्य मांसभक्षी प्राणी दृष्टिगोचर होते थे ॥ १३ ॥ भक्षयन्तश्च मांसानि पिबन्तश्चापि शोणितम् । विलुम्पन्तश्च केशांश्च मज्जांश्च बहुधा नृप ॥ १४ ॥ नरेश्वर! वे मांस खाते, रक्त पीते और केशों तथा मज्जाको बारंबार नोचते थे ॥ १४ ॥ आकर्षन्तः शरीराणि शरीरावयवांस्तथा । नराश्वगजसंघानां शिरांसि च ततस्ततः ॥ १५ ॥ मनुष्यों, घोड़ों तथा हाथियोंके समूहोंके सम्पूर्ण शरीरों और अवयवों एवं मस्तकोंको इधर-उधर खींचते थे ॥ १५ ॥