महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 650, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारत! मोती और मूँगोंसे चित्रित तथा मणियों और सुवर्णोंसे विभूषित ध्वज, विचित्र आभूषण, सुवर्णमय कवच, वैजयन्ती, पताका, हाथियोंके झूल और कम्बल, चमचमाते हुए तीखे शस्त्र, घोड़ोंकी पीठपर बिछाये जानेवाले वस्त्र, हाथियोंके कुम्भस्थलमें और मस्तकोंपर सुशोभित होनेवाली सोने-चाँदीकी मालाएँ तथा दन्तवेष्टन—इन सब वस्तुओंके कारण उभयपक्षकी सेनाएँ वर्षाकालमें बगलोंकी पाँति, खद्योत, ऐरावत और बिजलियोंसे युक्त मेघसमूहोंके समान दृष्टिगोचर हो रही थीं ।। २८—३१ १/२ ।।
अपश्यन्नस्मदीयाश्च ते च यौधिष्ठिराः स्थिताः ।। ३२ ।।
तद् युद्धं युयुधानस्य द्रोणस्य च महात्मनः ।
राजन्! हमारी और युधिष्ठिरकी सेनाके सैनिक वहाँ खड़े होकर महामना द्रोण और सात्यकिका वह युद्ध देख रहे थे ।। ३२ १/२ ।।
विमानाग्रगता देवा ब्रह्मसोमपुरोगमाः ।। ३३ ।।
सिद्धचारणसंघाश्च विद्याधरमहोरगाः ।
ब्रह्मा और चन्द्रमा आदि सब देवता विमानोंपर बैठकर वहाँ युद्ध देखनेके लिये आये थे। उनके साथ ही सिद्धों और चारणोंके समूह, विद्याधर और बड़े-बड़े नागगण भी थे ।। ३३ १/२ ।।
गतप्रत्यागताक्षेपैश्चित्रैरस्त्रविघातिभिः ।। ३४ ।।
विविधैर्विस्मयं जग्मुस्तयोः पुरुषसिंहयोः ।
वे सब लोग उन दोनों पुरुषसिंहोंके विचित्र गमन-प्रत्यागमन, आक्षेप तथा नाना प्रकारके अस्त्रनिवारक व्यापारोंसे आश्चर्यचकित हो रहे थे ।। ३४ १/२ ।।
हस्तलाघवमस्त्रेषु दर्शयन्तौ महाबलौ ।। ३५ ।।
अन्योन्यमभिविध्येतां शरैस्तौ द्रोणसात्यकी ।
महावीर द्रोणाचार्य और सात्यकि अस्त्र चलानेमें अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए बाणोंद्वारा एक-दूसरेको बेध रहे थे ।। ३५ १/२ ।।
ततो द्रोणस्य दाशार्हः शरांश्चिच्छेद संयुगे ।। ३६ ।।
पत्रिभिः सुदृढैराशु धनुश्चैव महाद्युतेः ।
इसी बीचमें सात्यकिने महातेजस्वी द्रोणाचार्यके धनुष और बाणोंको पंखयुक्त सुदृढ़ बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें शीघ्र ही काट डाला ।। ३६ १/२ ।।
निमेषान्तरमात्रेण भारद्वाजोऽपरं धनुः ।। ३७ ।।
सज्यं चकार तदपि चिच्छेदास्य च सात्यकिः ।
तब भरद्वाजनन्दन द्रोणने पलक मारते-मारते दूसरा धनुष हाथमें लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी; परंतु सात्यकिने उनके उस धनुषको भी काट डाला ।। ३७ १/२ ।।
ततस्त्वरन् पुनर्द्रोणो धनुर्हस्तो व्यतिष्ठत ।। ३८ ।।