भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 810

हार्दिक्यं योधवर्यं च मन्ये प्राप्तं धनंजयम् । न हि मे जायते त्रासो दृष्ट्वा सैन्यान्यनेकशः ॥ ७ ॥ वह्नेरिव प्रदीप्तस्य वने शुष्कतृणोलपे । 'योद्धाओंमें श्रेष्ठ कृतवर्माको पराजित करके मैं ऐसा समझता हूँ कि अर्जुन मुझे मिल गये। जैसे सूखे तृण और लतावाले वनमें प्रज्वलित हुई अग्निके लिये कहीं कोई बाधा नहीं रहती, उसी प्रकार मुझे इन अनेक सेनाओंको देखकर तनिक भी त्रास नहीं हो रहा है ।। पश्य पाण्डवमुख्येन यातां भूमिं किरीटिना ॥ ८ ॥ पत्त्यश्वरथनागौघैः पतितैर्विषमीकृताम् । 'देखो, पाण्डवप्रवर किरीटधारी अर्जुन जिस मार्गसे गये हैं, वहाँकी भूमि धराशायी हुए पैदलों, घोड़ों, रथों और हाथियोंके समुदायसे विषम एवं दुर्लङ्घ्य हो गयी है ।। ८ ½ ।। द्रवते तद् यथा सैन्यं तेन भग्नं महात्मना ॥ ९ ॥ रथैर्विपरिधावद्भिर्गजैरश्वैश्च सारथे । कौशेयारुणसंकाशमेतदुद्धूयते रजः ॥ १० ॥ 'सारथे! उन्हीं महात्मा अर्जुनकी खदेड़ी हुई वह सेना इधर-उधर भाग रही है। दौड़ते हुए रथों, हाथियों और घोड़ोंसे लाल रेशमके समान यह धूल ऊपरको उठ रही है ।। ९-१० ।। अभ्याशस्थमहं मन्ये श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् । स एष श्रूयते शब्दो गाण्डीवस्यामितौजसः ॥ ११ ॥ 'इससे मैं समझता हूँ कि श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं, वे श्वेतवाहन अर्जुन हमारे निकट ही हैं, तभी यह अमित शक्तिशाली गाण्डीव धनुषकी टंकार सुनायी दे रही है ।। ११ ।। यादृशानि निमित्तानि मम प्रादुर्भवन्ति वै । अनस्तंगत आदित्ये हन्ता सैन्धवमर्जुनः ॥ १२ ॥ 'इस समय मेरे सामने जैसे शुभ शकुन प्रकट हो रहे हैं, उनसे जान पड़ता है अर्जुन सूर्यास्त होनेके पहले ही जयद्रथको मार डालेंगे ।। १२ ।। शनैर्विश्रम्भयन्नश्वांन् याहि यत्रारिवाहिनी । यत्रैते सतलत्राणाः सुयोधनपुरोगमाः ॥ १३ ॥ 'सूत! धीरे-धीरे घोड़ोंको आराम देते हुए उस ओर चलो, जहाँ वह शत्रुसेना खड़ी है, जहाँ ये तलत्राण धारण किये दुर्योधन आदि योद्धा उपस्थित हैं ।। १३ ।।