महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 931, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेन और कर्णका युद्ध, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्मुखका वध तथा कर्णका पलायन
संजय उवाच
सर्वथा विरथः कर्णः पुनर्भीमेन निर्जितः ।
रथमन्यं समास्थाय पुनर्विव्याध पाण्डवम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! सब प्रकारसे रथहीन एवं भीमसेनके द्वारा पुनः पराजित हुए कर्णने दूसरे रथपर बैठकर पाण्डुकुमार भीमसेनको पुनः बींध डाला ॥ १ ॥
महागजाविवासाद्य विषाणाग्रैः परस्परम् ।
शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ २ ॥
जैसे दो विशाल गजराज अपने दाँतोंके अग्रभागोंद्वारा एक-दूसरेसे भिड़ गये हों, उसी प्रकार कर्ण और भीमसेन धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बाणोंद्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे ॥ २ ॥
अथ कर्णः शरव्रातैर्भीमसेनं समर्पयत् ।
ननाद च महानादं पुनर्विव्याध चोरसि ॥ ३ ॥
तदनन्तर कर्णने अपने बाणसमूहोंद्वारा भीमसेनको घायल कर दिया। उसने बड़े जोरसे गर्जना की और पुनः भीमसेनकी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ ३ ॥
तं भीमो दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यदजिह्मगैः ।
पुनर्विव्याध सप्तत्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ ४ ॥
तब भीमने सीधे जानेवाले दस बाणोंसे कर्णको मारकर बदला चुकाया। तत्पश्चात् झुकी हुई गाँठवाले सत्तर बाणोंद्वारा पुनः कर्णको बींध डाला ॥ ४ ॥
कर्णं तु नवभिर्भीमो भित्त्वा राजन् स्तनान्तरे ।
ध्वजमेकेन विव्याध सायकेन शितेन ह ॥ ५ ॥
राजन्! भीमसेनने कर्णकी छातीमें नौ बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचाकर एक तीखे बाणसे उसकी ध्वजाको भी छेद दिया ॥ ५ ॥
सायकानां ततः पार्थस्त्रिषष्ट्या प्रत्यविध्यत ।
तोत्रैरिव महानागं कशाभिरिव वाजिनम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर जैसे विशाल गजराजको अंकुशोंसे और घोड़ेको कोड़ोंसे पीटा जाय, उसी प्रकार कुन्तीकुमार भीमने तिरसठ बाणोंद्वारा कर्णको घायल कर दिया ॥ ६ ॥
सोऽतिविद्धो महाराज पाण्डवेन यशस्विना ।