भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 994

स मां निहन्यात् संग्रामे यो मां कुर्यान्निरायुधम् ॥ १५ ॥ 'मुझे केवल बातें बनाकर नहीं डराया जा सकता। संग्राममें जो मुझे शस्त्रहीन कर दे, वही मेरा वध कर सकता है ।। १५ ।।

समास्तु शाश्वतीर्हन्याद् यो मां हन्याद्धि संयुगे । किं वृथोक्तेन बहुना कर्मणा तत् समाचर ॥ १६ ॥ 'जो युद्धमें मुझे मार सकता है, वह सदा सर्वत्र अपने शत्रुओंका वध कर सकता है। अस्तु, व्यर्थ ही बहुत-सी बातें बनानेसे क्या लाभ? तुमने जो कुछ कहा है, उसे करके दिखाओ ।। १६ ।।

शारदस्येव मेघस्य गर्जितं निष्फलं हि ते । श्रुत्वा त्वद्गर्जितं वीर हास्यं हि मम जायते ॥ १७ ॥ 'शरत्कालके मेघके समान तुम्हारे इस गर्जन-तर्जनका कुछ फल नहीं है। वीर! तुम्हारी यह गर्जना सुनकर मुझे हँसी आती है ।। १७ ।।

चिरकालेप्सितं लोके युद्धमद्यास्तु कौरव । त्वरते मे मतिस्तात तव युद्धाभिकाङ्क्षिणी ॥ १८ ॥ नाहत्वाहं निवर्तिष्ये त्वामद्य पुरुषाधम । 'कौरव! इस लोकमें मेरी भी तुम्हारे साथ युद्ध करनेकी बहुत दिनोंसे अभिलाषा थी। वह आज पूरी हो जाय। तात! तुमसे युद्धकी अभिलाषा रखनेवाली मेरी बुद्धि मुझे जल्दी करनेके लिये प्रेरणा दे रही है। पुरुषाधम! आज तुम्हारा वध किये बिना मैं पीछे नहीं हटूँगा' ।। १८ १/२ ।।

अन्योन्यं तौ तथा वाग्भिस्तक्षन्तौ नरपुङ्गवौ ॥ १९ ॥ जिघांसू परमक्रुद्धावभिजघ्नतुराहवे । इस प्रकार एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छावाले वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर परस्पर वाग्बाणोंका प्रहार करते हुए उस युद्धस्थलमें अत्यन्त कुपित हो बाणोंद्वारा आघात करने लगे ।। १९ १/२ ।।

समेतौ तौ महेष्वासौ शुष्मिणौ स्पर्धिनौ रणे ॥ २० ॥ द्विरदाविव संक्रुद्धौ वासितार्थे मदोत्कटौ । वे दोनों महाधनुर्धर और पराक्रमी वीर उस रणक्षेत्रमें एक-दूसरेसे स्पर्धा रखते हुए हथिनीके लिये अत्यन्त कुपित होकर परस्पर युद्ध करनेवाले दो मदोन्मत्त हाथियोंकी तरह एक-दूसरेसे भिड़ गये ।। २० १/२ ।।

भूरिश्रवाः सात्यकिश्च ववर्षतुररिंदमौ ॥ २१ ॥ शरवर्षाणि घोराणि मेघाविव परस्परम् । भूरिश्रवा और सात्यकि दोनों शत्रुदमन वीरोंने दो मेघोंकी भाँति परस्पर भयंकर बाण-वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। २१ १/२ ।।