महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1003, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं बालं भूतले क्षिप्य प्रतिगन्तुं न शक्नुयुः ॥ ६ ॥ वे उसकी पहलेकी बातोंको बारंबार याद करके शोकमग्न हो जाते थे; इसलिये उसे श्मशानभूमिमें डालकर लौट जानेमें असमर्थ हो रहे थे ॥ ६ ॥
तेषां रुदितशब्देन गृध्रोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् । एकात्मजमिमं लोके त्यक्त्वा गच्छत मा चिरम् ॥ ७ ॥ इह पुंसां सहस्राणि स्त्रीसहस्राणि चैव ह । समानीतानि कालेन हित्वा वै यान्ति बान्धवाः ॥ ८ ॥ उनके रोनेके शब्दसे आकृष्ट होकर एक गीध वहाँ आया और इस प्रकार कहने लगा—'मनुष्यों! इस जगत्में अपने इस इकलौते पुत्रको यहाँ छोड़कर लौट जाओ, देर मत करो। यहाँ हजारों स्त्री-पुरुष कालके द्वारा लाये जा चुके हैं और उन सबको उनके भाई-बन्धु छोड़कर चले जाते हैं ॥ ७-८ ॥
सम्पश्यत जगत् सर्वं सुखदुःखैरधिष्ठितम् । संयोगो विप्रयोगश्च पर्यायेणोपलभ्यते ॥ ९ ॥ 'देखो, यह सम्पूर्ण जगत् ही सुख और दुःखसे व्याप्त है, यहाँ सबको बारी-बारीसे संयोग और वियोग प्राप्त होते रहते हैं ॥ ९ ॥
गृहीत्वा ये च गच्छन्ति ये न यान्ति च तान् मृतान् । तेऽप्यायुषः प्रमाणेन स्वेन गच्छन्ति जन्तवः ॥ १० ॥ 'जो लोग अपने मृतक सम्बन्धियोंको लेकर श्मशानमें जाते हैं, और जो नहीं जाते हैं, वे सभी जीव-जन्तु अपनी आयु पूरी होनेपर इस संसारसे चल बसते हैं ॥ १० ॥
अलं स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन् गृध्रगोमायुसंकुले । कङ्कालबहुले रौद्रे सर्वप्राणिभयङ्करे ॥ ११ ॥ 'गीधों और गीदड़ोंसे भरे हुए इस भयंकर श्मशानमें सब ओर असंख्य नरकंकाल पड़े हैं। यह स्थान सभी प्राणियोंके लिये भयदायक है। यहाँ तुम्हें नहीं ठहरना चाहिये; ठहरनेसे कोई लाभ भी नहीं है ॥ ११ ॥'
न पुनर्जीवितः कश्चित् कालधर्ममुपागतः । प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी ॥ १२ ॥ 'अपना प्रिय हो या द्वेषपात्र। कोई भी कालधर्ममें (मृत्यु) को पाकर कभी पुनः जीवित नहीं हुआ है। समस्त प्राणियोंकी ऐसी ही गति है ॥ १२ ॥
सर्वेण खलु मर्तव्यं मर्त्यलोके प्रसूयता । कृतान्तविहिते मार्गे मृतं को जीवयिष्यति ॥ १३ ॥ 'जिसने इस मर्त्यलोकमें जन्म लिया है, उसे एक-न-एक दिन अवश्य मरना होगा। कालद्वारा निर्मित पथपर मरकर गये हुए प्राणीको कौन जीवित कर सकेगा ॥ १३ ॥
कर्मान्तविरते लोके अस्तं गच्छति भास्करे ।