महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1004, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंगम्यतां स्वमधिष्ठानं सुतस्नेहं विसृज्य वै ॥ १४ ॥
‘सूर्य अस्ताचलको जा रहे हैं, जगत्के सब लोग दैनिक कार्य समाप्त करके अब उससे विरत हो रहे हैं। तुमलोग भी अब अपने पुत्रका स्नेह छोड़कर घर लौट जाओ’ ॥ १४ ॥
ततो गृध्रवचः श्रुत्वा प्राक्रोशंस्तस्तदा नृप ।
बान्धवास्तेऽभ्यगच्छन्त पुत्रमुत्सृज्य भूतले ॥ १५ ॥
नरेश्वर! तब गीधकी बात सुनकर वे बन्धु-बान्धव जोर-जोरसे रोते हुए अपने पुत्रको भूतलपर छोड़कर घरकी ओर लौटने लगे ॥ १५ ॥
विनिश्चित्याथ च तदा विक्रोशन्तस्ततस्ततः ।
मृतमित्येव गच्छन्तो निराशास्तस्य दर्शने ॥ १६ ॥
वे इधर-उधर रो-गाकर इसी निश्चयपर पहुँचे कि अब तो यह बालक मर ही गया; अतः उसके दर्शनसे निराश हो वहाँसे जानेके लिये तैयार हो गये ॥ १६ ॥
निश्चितार्थाश्च ते सर्वे संत्यजन्तः स्वमात्मजम् ।
निराशा जीविते तस्य मार्गमावृत्य धिष्ठिताः ॥ १७ ॥
जब उन्हें यह निश्चित हो गया कि अब यह नहीं जी सकेगा, तो उसके जीवनसे निराश हो वे सब लोग अपने बच्चेको छोड़कर जानेके लिये रास्तेपर आकर खड़े हुए ॥ १७ ॥
ध्वांक्षपक्षसवर्णस्तु बिलान्निःसृत्य जम्बुकः ।
गच्छमानान् स्म तानाह निर्घृणाः खलु मानुषाः ॥ १८ ॥
इतनेहीमें कौएकी पाँखके समान काले रंगका एक गीदड़ अपनी माँद (घूरी) से निकलकर उन लौटते हुए बान्धवोंसे कहा—‘मनुष्यों! तुम बड़े निर्दय हो! ॥ १८ ॥
आदित्योऽयं स्थितो मूढाः स्नेहं कुरुत मा भयम् ।
बहुरूपो मुहूर्तश्च जीवेदपि कदाचन ॥ १९ ॥
‘अरे मूर्खो! अभी तो सूर्यास्त भी नहीं हुआ है; अतः डरो मत। बच्चेको लाड़-प्यार कर लो। अनेक प्रकारका मुहूर्त आता रहता है। सम्भव है किसी शुभ घड़ीमें यह बालक जी उठे ॥ १९ ॥
यूयं भूमौ विनिक्षिप्य पुत्रस्नेहविनाकृताः ।
श्मशाने सुतमुत्सृज्य कस्माद् गच्छत निर्घृणाः ॥ २० ॥
‘तुम लोग कैसे निर्दयी हो? पुत्रस्नेहका त्याग करके इस नन्हेंसे बालकको श्मशान-भूमिमें लाकर डाल दिया। अरे! अपने बेटेको इस मरघटमें छोड़कर क्यों जा रहे हो? ॥ २० ॥
न वोऽस्त्यस्मिन् सुते स्नेहो बाले मधुरभाषिणि ।
यस्य भाषितमात्रेण प्रसादमधिगच्छत ॥ २१ ॥
‘जान पड़ता है’ इस मधुर भाषी छोटे-से बालकपर तुम्हारा तनिक भी स्नेह नहीं है। यह वही बालक है, जिसकी मीठी-मीठी बातें सुनते ही तुम्हारा हृदय हर्षसे खिल उठता