महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1005, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंथा ॥ २१ ॥ ते पश्यत सुतस्नेहो यादृशः पशुपक्षिणाम् । न तेषां धारयित्वा तान् कश्चिदस्ति फलागमः ॥ २२ ॥ चतुष्पात्पक्षिकीटानां प्राणिनां स्नेहसङ्गिनाम् । परलोकगतिस्थानां मुनियज्ञक्रिया इव ॥ २३ ॥ 'पशु और पक्षियोंका भी अपने बच्चेपर जैसा स्नेह होता है, उसे तुम देखो। यद्यपि स्नेहमें आसक्त उन पशु-पक्षी-कीट आदि प्राणियोंको अपने बच्चोंके पालन-पोषण करनेपर भी परलोकमें उनसे उस प्रकार कोई फल नहीं मिलता जैसे कि परलोककी गतिमें स्थित हुए मुनियोंको यज्ञादि क्रियासे मिलता है ॥ २२-२३ ॥ तेषां पुत्राभिरामाणामिहलोके परत्र च । न गुणो दृश्यते कश्चित् प्रजाः संधारयन्ति च ॥ २४ ॥ 'क्योंकि उनके पुत्रोंमें स्नेह रखनेवाले पशु आदि के लिये इहलोक और परलोकमें संतानोंके लालन-पालनसे कोई लाभ नहीं दिखायी देता तो भी वे अपने-अपने बच्चोंकी रक्षा करते रहते हैं ॥ २४ ॥ अपश्यतां प्रियान् पुत्रांस्तेषां शोको न तिष्ठति । न च पुष्णन्ति संवृद्धास्ते मातापितरौ क्वचित् ॥ २५ ॥ 'यद्यपि उनके बच्चे बड़े हो जानेपर अपने माँ-बापका पालन-पोषण नहीं करते हैं तो भी अपने प्यारे बच्चोंको न देखनेपर उनका शोक काबूमें नहीं रहता ॥ मानुषाणां कुतः स्नेहो येषां शोको भविष्यति । इमं कुलकरं पुत्रं त्यक्त्वा क्व नु गमिष्यथ ॥ २६ ॥ 'परंतु मनुष्योंमें इतना स्नेह ही कहाँ है, जो उन्हें अपने बच्चोंके लिये शोक होगा। अरे! यह तुम्हारा वंशधर बालक है। इसे छोड़कर तुम कहाँ जाओगे ॥ २६ ॥ चिरं मुञ्चत बाष्पं च चिरं स्नेहेन पश्यत । एवंविधानि हीष्टानि दुस्त्यजानि विशेषतः ॥ २७ ॥ 'इस अपने लाड़लेके लिये देरतक आँसू बहाओ और दीर्घ कालतक स्नेहभरी दृष्टिसे इसकी ओर देखो, क्योंकि ऐसी प्यारी-प्यारी संतानोंको छोड़कर जाना अत्यन्त कठिन है ॥ २७ ॥ क्षीणस्यार्थाभियुक्तस्य श्मशानाभिमुखस्य च । बान्धवा यत्र तिष्ठन्ति तत्रान्यो नाधितिष्ठति ॥ २८ ॥ 'जो शरीरसे क्षीण हुआ हो, जिसपर कोई आर्थिक अभियोग लगाया गया हो तथा जो श्मशानकी ओर जा रहा हो, ऐसे अवसरोंपर उसके भाई-बन्धु ही उसके साथ खड़े होते हैं। दूसरा कोई वहाँ साथ नहीं देता ॥ २८ ॥ सर्वस्य दयिताः प्राणाः सर्वः स्नेहं च विन्दति ।