महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1074, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
कथान्तरमथासाद्य खड्गयुद्धविशारदः ।
नकुलः शरतल्पस्थमिदमाह पितामहम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कथाप्रसङ्गकी समाप्तिके समय अवसर पाकर खड्गयुद्धविशारद नकुलने बाणशय्यापर सोये हुए पितामह भीष्मसे इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥
नकुल उवाच
धनुः प्रहरणं श्रेष्ठमतीवात्र पितामह ।
मतस्तु मम धर्मज्ञ खड्ग एव सुसंशितः ॥ २ ॥
नकुल बोले—धर्मज्ञ पितामह! यद्यपि इस जगत्में धनुष अत्यन्त श्रेष्ठ अस्त्र समझा जाता है, तथापि मुझे तो अत्यन्त तीखा खड्ग ही अच्छा जान पड़ता है ॥ २ ॥
विशीर्णे कार्मुके राजन् प्रक्षीणेषु च वाजिषु ।
खड्गेन शक्यते युद्धे साध्वात्मा परिरक्षितुम् ॥ ३ ॥
राजन्! जब धनुष टूट जाय और घोड़े भी नष्ट हो जायँ तब भी युद्धस्थलमें खड्गके द्वारा अपने शरीरकी भलीभाँति रक्षा की जा सकती है ॥ ३ ॥
शरासनधरांश्चैव गदाशक्तिधरांस्तथा ।
एकः खड्गधरो वीरः समर्थः प्रतिबाधितुम् ॥ ४ ॥
एक ही खड्गधारी वीर धनुष, गदा और शक्ति धारण करनेवाले बहुत-से योद्धाओंको बाधा देनेमें समर्थ है ॥ ४ ॥
अत्र मे संशयश्चैव कौतूहलमतीव च ।
किंस्वित् प्रहरणं श्रेष्ठं सर्वयुद्धेषु पार्थिव ॥ ५ ॥
पृथ्वीनाथ! इस विषयमें मेरे मनमें संशय और अत्यन्त कौतूहल भी हो रहा है कि सम्पूर्ण युद्धोंमें कौन-सा आयुध श्रेष्ठ है? ॥ ५ ॥
कथं चोत्पादितः खड्गः कस्मै चार्थाय केन च ।
पूर्वाचार्यं च खड्गस्य प्रब्रूहि प्रपितामह ॥ ६ ॥
पितामह! खड्गकी उत्पत्ति कैसे और किस प्रयोजनके लिये हुई? किसने इसे उत्पन्न किया? खड्गयुद्धका प्रथम आचार्य कौन था? यह सब मुझे बताइये ॥ ६ ॥