महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'महाराज! जनेश्वर! ऐसी स्थितिमें आपको राज्यके प्रति आकृष्ट करनेका जो कारण है, उसे ही यहाँ बता रहा हूँ। आप एकाग्रचित्त होकर सुनें ।। ७ ।। द्विविधो जायते व्याधिः शारीरो मानसस्तथा । परस्परं तयोर्जन्म निर्द्वन्द्वं नोपलभ्यते ।। ८ ।। 'मनुष्यको दो प्रकारकी व्याधियाँ होती हैं—एक शारीरिक और दूसरी मानसिक। इन दोनोंकी उत्पत्ति एक-दूसरेके आश्रित है। एकके बिना दूसरीका होना सम्भव नहीं है ।। ८ ।। शारीराज्जायते व्याधिर्मानसो नात्र संशयः । मानसाज्जायते वापि शारीर इति निश्चयः ।। ९ ।। 'कभी शारीरिक व्याधिसे मानसिक व्याधि होती है, इसमें संशय नहीं है। इसी प्रकार कभी मानसिक व्याधिसे शारीरिक व्याधिका होना भी निश्चित ही है ।। शारीरं मानसं दुःखं योऽतीतमनुशोचति । दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थौ च विन्दति ।। १० ।। 'जो मनुष्य बीते हुए मानसिक अथवा शारीरिक दुःखके लिये बारंबार शोक करता है, वह एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता है। उसे दो-दो अनर्थ भोगने पड़ते हैं ।। शीतोष्णे चैव वायुश्च त्रयः शारीरजा गुणाः । तेषां गुणानां साम्यं यत्तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ।। ११ ।। 'सर्दी, गर्मी और वायु (कफ, पित्त और वात) ये तीन शारीरिक गुण हैं। इन गुणोंका साम्यावस्थामें रहना ही स्वस्थताका लक्षण बताया गया है ।। ११ ।। तेषामन्यतमोद्रेके विधानमुपदिश्यते । उष्णेन बाध्यते शीतं शीतेनोष्णं प्रबाध्यते ।। १२ ।। 'उन तीनोंमेंसे यदि किसी एककी वृद्धि हो जाय तो उसकी चिकित्सा बतायी जाती है। उष्ण द्रव्यसे सर्दी और शीत पदार्थसे गर्मीका निवारण होता है ।। १२ ।। सत्त्वं रजस्तम इति मानसाः स्युस्त्रयो गुणाः । तेषां गुणानां साम्यं यत्तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ।। १३ ।। 'सत्त्व, रज और तम—ये तीन मानसिक गुण हैं। इन तीनों गुणोंका सम अवस्थामें रहना मानसिक स्वास्थ्यका लक्षण बताया गया है ।। १३ ।। तेषामन्यतमोत्सेके विधानमुपदिश्यते । हर्षेण बाध्यते शोको हर्षः शोकेन बाध्यते ।। १४ ।। 'इनमेंसे किसी एककी वृद्धि होनेपर उपचार बताया जाता है। हर्ष (सत्त्व)-के द्वारा शोक (रजोगुण)-का निवारण होता है और शोकके द्वारा हर्षका ।। १४ ।। कश्चित् सुखे वर्तमानो दुःखस्य स्मर्तुमिच्छति । कश्चिद् दुःखे वर्तमानः सुखस्य स्मर्तुमिच्छति ।। १५ ।।