भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1197

तथा खरो मृदू रूक्षो लघुर्गुरुतरोऽपि च । एवं द्वादशधा स्पर्शो वायव्यो गुण उच्यते ॥ ३७ ॥ उष्ण, शीत, सुख, दुःख, स्निग्ध, विशद, खर, मृदु, रूक्ष, हलका, भारी और अधिक भारी—इस प्रकार वायु-सम्बन्धी स्पर्श गुणके बारह भेद कहे जाते हैं ॥ ३६-३७ ॥

तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम् । तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरं विविधात्मकम् ॥ ३८ ॥ षड्ज ऋषभगान्धारौ मध्यमो धैवतस्तथा । पञ्चमश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादवान् ॥ ३९ ॥ एष सप्तविधः प्रोक्तो गुण आकाशसम्भवः । आकाशका एकमात्र गुण शब्द ही माना गया है। उस शब्दगुणका अनेक भेदोंमें जो विस्तार हुआ है, उसका वर्णन करता हूँ—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा निषाद—ये आकाशजनित शब्द गुणके सात भेद बताये गये हैं, जिन्हें जानना चाहिये ॥ ३८-३९ १/२ ॥

ऐश्वर्येण तु सर्वत्र स्थितोऽपि पटहादिषु ॥ ४० ॥ मृदङ्गभेरीशङ्खानां स्तनयित्नो रथस्य च । यः कश्चिच्छूयते शब्दः प्राणिनोऽप्राणिनोऽपि वा । एतेषामेव सर्वेषां विषये सम्प्रकीर्तितः ॥ ४१ ॥ अपने व्यापक स्वरूपसे तो शब्द सर्वत्र है, किंतु पटह (नगाड़े) आदिमें इसकी विशेषरूपसे अभिव्यक्ति होती है। मृदंग, भेरी, शंख, मेघ तथा रथकी घर्घरहाट आदिमें जो कुछ शब्द सुना जाता है और जड या चेतनका जो कुछ भी शब्द श्रवणगोचर होता है, वह सब इन सात भेदोंके ही अन्तर्गत बताया गया है ॥ ४०-४१ ॥

एवं बहुविधाकारः शब्द आकाशसम्भवः । आकाशजं शब्दमाहुरेभिर्वायुगुणैः सह ॥ ४२ ॥ इस प्रकार आकाशजनित शब्दके अनेक भेद हैं। वायुसम्बन्धी गुणोंके साथ ही आकाशजनित शब्द होता है; ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं ॥ ४२ ॥

अव्याहतैश्चेतयते न वेत्ति विषमस्थितैः । आप्याय्यन्ते च ते नित्यं धातवस्तैस्तु धातुभिः ॥ ४३ ॥ जब वायुसम्बन्धी गुण बाधित न होकर शब्दके साथ रहता है, तब मनुष्य शब्दको सुनता और समझता है; किंतु जब वायुसम्बन्धी गुण दीवार अथवा प्रतिकूल वायुसे बाधित होकर विषम अवस्थामें स्थित हो जाते हैं, तब शब्दका ग्रहण नहीं होता है। वे शब्द आदिके उत्पादक धातु (इन्द्रियगोलक) धातुओं (इन पाँचों भूतों) द्वारा ही पोषित होते हैं ॥ ४३ ॥

आपोऽग्निर्मारुतश्चैव नित्यं जाग्रति देहिषु । मूलमेते शरीरस्य व्याप्य प्राणानिह स्थिताः ॥ ४४ ॥