भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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सप्तदशोऽध्यायः

युधिष्ठिरद्वारा भीमकी बातका विरोध करते हुए मुनिवृत्तिकी और ज्ञानी महात्माओंकी प्रशंसा

युधिष्ठिर उवाच

असंतोषः प्रमादश्च मदो रागोऽप्रशान्तता ।
बलं मोहोऽभिमानश्चाप्युद्वेगश्चैव सर्वशः ॥ १ ॥
एभिः पाप्मभिराविष्टो राज्यं त्वमभिकांक्षसे ।
निरामिषो विनिर्मुक्तः प्रशान्तः सुसुखी भव ॥ २ ॥

युधिष्ठिर बोले— भीमसेन! असंतोष, प्रमाद, मद, राग, अशान्ति, बल, मोह, अभिमान तथा उद्वेग—ये सभी पाप तुम्हारे भीतर घुस गये हैं, इसीलिये तुम्हें राज्यकी इच्छा होती है। भाई! सकाम कर्म और बन्धनसे* रहित होकर सर्वथा मुक्त, शान्त एवं सुखी हो जाओ ॥ १-२ ॥

य इमामखिलां भूमिं शिष्यादेको महीपतिः ।
तस्याप्युदरमेकं वै किमिदं त्वं प्रशंससि ॥ ३ ॥

जो सम्राट् इस सारी पृथ्वीका अकेला ही शासन करता है, उसके पास भी एक ही पेट होता है; अतः तुम किसलिये इस राज्यकी प्रशंसा करते हो? ॥ ३ ॥

नाह्ना पूरयितुं शक्यां न मासैर्भरतर्षभ ।
अपूर्र्या पूरयन्निच्छामायुषापि न शक्नुयात् ॥ ४ ॥

भरतश्रेष्ठ! इस इच्छाको एक दिनमें या कई महीनोंमें भी पूर्ण नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं, सारी आयु प्रयत्न करनेपर भी इस अपूरणीय इच्छाकी पूर्ति होनी असम्भव है ॥ ४ ॥

यथेद्धः प्रज्वलत्यग्निरसमिद्धः प्रशाम्यति ।
अल्पाहारतया त्वग्निं शमयौदर्यमुत्थितम् ॥ ५ ॥

जैसे आगमें जितना ही ईंधन डालो, वह प्रज्वलित होती जायगी और ईंधन न डाला जाय तो वह अपने-आप आप बुझ जाती है। इसी प्रकार तुम भी अपना आहार कम करके इस जगी हुई जठराग्निको शान्त करो ॥ ५ ॥

आत्मोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु ।
जयोदरं पृथिव्या ते श्रेयो निर्जितया जितम् ॥ ६ ॥

अज्ञानी मनुष्य अपने पेटके लिये ही बहुत हिंसा करता है; अतः तुम पहले अपने पेटको ही जीतो। फिर ऐसा समझा जायगा कि इस जीती हुई पृथ्वीके द्वारा तुमने