महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1224, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो द्विज गुरुकी आराधना करके वेदाध्ययन करता है, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है
और उसका मानसिक संकल्प सिद्ध होता है ।। ९ ।।
गार्हस्थ्यं खलु द्वितीयमाश्रमं वदन्ति । तस्य समुदाचारलक्षणं
सर्वमनुव्याख्यास्यामः । समावृत्तानां सदाचाराणां सहधर्मचर्यफलार्थिनां गृहाश्रमो
विधीयते । धर्मार्थकामावाप्तिर्ह्यत्र त्रिवर्गसाधनमपेक्ष्यागर्हितेन कर्मणा धनान्यादाय
स्वाध्यायोपलब्धप्रकर्षेण वा ब्रह्मर्षिनिर्मितेन वा अद्रिसारगतेन वा ।
हव्यकव्यनियमाभ्यासदैवत-प्रसादोपलब्धेन वा धनेन गृहस्थो गार्हस्थ्यं वर्तयेत् ।
तद्धि सर्वाश्रमाणां मूलमुदाहरन्ति । गुरुकुलनिवासिनः परिव्राजका ये चान्ये
संकल्पितव्रतनियम-धर्मानुष्ठायिनस्तेषामप्यत एव भिक्षाबलिसंविभागाः
प्रवर्तन्ते ।। १० ।।
गार्हस्थ्यको दूसरा आश्रम कहते हैं। अब हम उसमें पालन करने योग्य समस्त उत्तम
आचरणोंकी व्याख्या करेंगे। जो सदाचारका पालन करनेवाले ब्रह्मचारी विद्या पढ़कर
गुरुकुलसे स्नातक होकर लौटते हैं, उन्हें यदि सहधर्मिणीके साथ रहकर धर्माचरण करने
और उसका फल पानेकी इच्छा हो तो उनके लिये गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी विधि है।
इस आश्रममें धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी प्राप्ति होती है; इसलिये त्रिवर्गसाधनकी इच्छा
रखकर गृहस्थको उत्तम कर्मके द्वारा धन संग्रह करना चाहिये, अर्थात् वह स्वाध्यायसे प्राप्त
हुई विशिष्ट योग्यतासे, ब्रह्मर्षियोंद्वारा धर्मशास्त्रोंमें निश्चित किये हुए मार्गसे अथवा पर्वतसे
उपलब्ध हुए उसके सारभूत मणि रत्न, दिव्यौषधि एवं स्वर्ण आदिसे धनका संचय करे।
अथवा हव्य (यज्ञ), कव्य (श्राद्ध), नियम, वेदाभ्यास तथा देवताओंकी प्रसन्नतासे प्राप्त
धनके द्वारा गृहस्थ पुरुष अपनी गृहस्थीका निर्वाह करे; क्योंकि गृहस्थ आश्रमको सब
आश्रमोंका मूल कहते हैं। गुरुकुलमें निवास करनेवाले ब्रह्मचारी, वनमें रहकर संकल्पके
अनुसार व्रत, नियम तथा धर्मोंका पालन करनेवाले अन्यान्य वानप्रस्थ एवं सब कुछ
त्यागकर सर्वत्र विचरनेवाले संन्यासी भी इस गृहस्थाश्रमसे ही भिक्षा, भेंट, उपहार तथा दान
आदि पाकर अपने-अपने धर्मके पालनमें प्रवृत्त होते हैं ।। १० ।।
वानप्रस्थानां च द्रव्योपस्कार इति प्रायशः खल्वेते साधवः साधुपथ्यौदनाः
स्वाध्यायप्रसङ्गिन-स्तीर्थाभिगमनदेशदर्शनार्थं पृथिवीं पर्यटन्ति । तेषां
प्रत्युत्थानाभिगमनाभिवादनानसूयवाक्प्रदानसुखश-
क्त्यासनसुखशयनाभ्यवहारसत्क्रिया चेति ।। ११ ।।
वानप्रस्थोंके लिये धनका संग्रह करना निषिद्ध है। ये श्रेष्ठ लोग प्रायः शुद्ध एवं हितकर
अन्नमात्रके इच्छुक होकर स्वाध्याय, तीर्थयात्रा एवं देश-दर्शनके निमित्त सारी पृथ्वीपर
घूमते-फिरते हैं। ये घरपर पधारें तो उठकर, आगे बढ़कर इनका स्वागत करे। इनके चरणोंमें
मस्तक झुकावे, दोषदृष्टि न रखकर उनसे उत्तम वचन बोले। यथाशक्ति सुखद आसन दे,