महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुखद शय्यापर उन्हें सुलावे और उत्तम भोजन करावे। इस प्रकार उनका पूर्ण सत्कार करे। यही उन श्रेष्ठ पुरुषके प्रति गृहस्थका कर्तव्य है ॥ ११ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः— अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ १२ ॥ इस विषयमें ये श्लोक प्रसिद्ध हैं— जिस गृहस्थके दरवाजेसे कोई अतिथि भिक्षा न पानेके कारण निराश होकर लौट जाता है, वह उस गृहस्थको अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है ॥
अपि चात्र यज्ञक्रियाभिर्देवताः प्रीयन्ते । निवापेन पितरो विद्याभ्यासश्रवणधारणेन ऋषयः । अपत्योत्पादनेन प्रजापतिरिति ॥ १३ ॥ इसके सिवा गृहस्थाश्रममें रहकर यज्ञ करनेसे देवता, श्राद्ध-तर्पण करनेसे पितर, वेद-शास्त्रोंके श्रवण, अभ्यास और धारणसे ऋषि तथा संतानोत्पादनसे प्रजापति प्रसन्न होते हैं ॥ १३ ॥
श्लोकौ चात्र भवतः— वात्सल्यात्सर्वभूतेभ्यो वाच्याः श्रोत्रसुखा गिरः । परितापोपघातश्च पारुष्यं चात्र गर्हितम् ॥ १४ ॥ इस विषयमें ये दो श्लोक प्रसिद्ध हैं— वाणी ऐसी बोलनी चाहिये, जिसमें सब प्राणियोंके प्रति स्नेह भरा हो तथा जो सुनते समय कानोंको सुखद जान पड़े। दूसरोंको पीड़ा देना, मारना और कटुवचन सुनाना—ये सब निन्दित कार्य हैं ॥ १४ ॥
अवज्ञानमहंकारो दम्भश्चैव विगर्हितः । अहिंसा सत्यमक्रोधः सर्वाश्रमगतं तपः ॥ १५ ॥ किसीका अनादर करना, अहंकार दिखाना और ढोंग करना—इन दुर्गुणोंकी भी विशेष निन्दा की गयी है। किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना और मनमें क्रोध न आने देना—यह सभी आश्रमवालोंके लिये उपयोगी तप है ॥ १५ ॥
अपि चात्र माल्याभरणवस्त्राभ्यङ्गनित्योपभोग-नृत्यगीतवादित्रश्रुतिसुखनयनाभिरामदर्शनानां प्राप्तिर्भक्ष्यभोज्यलेह्यपेयचोष्याणामभ्यवहार्याणां विविधाना-मुपभोगः । स्वविहारसंतोषः कामसुखा-वाप्तिरिति ॥ १६ ॥ इसके सिवा इस गृहस्थ-आश्रममें फूलोंकी माला, नाना प्रकारके आभूषण, वस्त्र, अंगराग (तेल-उबटन), नित्य उपभोगकी वस्तु, नृत्य, गीत, वाद्य, श्रवणसुखद शब्द और नयनाभिराम रूपके दर्शनकी भी प्राप्ति होती है। भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, पेय और चोष्यरूप