भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 123

है ।। १३ ।। निरामिषा न शोचन्ति शोचसि त्वं किमामिषम् । परित्यज्यामिषं सर्वं मृषावादात् प्रमोक्ष्यसे ।। १४ ।। जिन्होंने भोगोंका परित्याग कर दिया है वे तो कभी शोक नहीं करते हैं; फिर तुम क्यों भोगोंकी चिन्ता करते हो? सारे भोगोंका परित्याग कर देनेपर तुम मिथ्यावादसे छूट जाओगे ।। १४ ।। पन्थानौ पितृयानश्च देवयानश्च विश्रुतौ । ईजानाः पितृयानेन देवयानेन मोक्षिणः ।। १५ ।। देवयान और पितृयान—ये दो परलोकके प्रसिद्ध मार्ग हैं। जो सकाम यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले हैं वे पितृयानसे जाते हैं और मोक्षके अधिकारी देवयानमार्गसे ।। तपसा ब्रह्मचर्येण स्वाध्यायेन महर्षयः । विमुच्य देहांस्ते यान्ति मृत्योरविषयं गताः ।। १६ ।। महर्षिगण तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्यायके बलसे देहत्यागके पश्चात् ऐसे लोकमें पहुँच जाते हैं जहाँ मृत्युका प्रवेश नहीं है ।। १६ ।। आमिषं बन्धनं लोके कर्महोक्तं तथामिषम् । ताभ्यां विमुक्तः पापाभ्यां पदमाप्नोति तत् परम् ।। १७ ।। इस जगत्में ममता और आसक्तिके बन्धनको आमिष कहा गया है। सकाम कर्म भी आमिष कहलाता है। इन दोनों आमिषस्वरूप पापोंसे जो मुक्त हो गया है वही परमपदको प्राप्त होता है ।। १७ ।। अपि गाथां पुरा गीतां जनकेन वदन्त्युत । निर्द्वन्द्वेन विमुक्तेन मोक्षं समनुपश्यता ।। १८ ।। इस विषयमें पूर्वकालमें राजा जनककी कही हुई एक गाथाका लोग उल्लेख किया करते हैं। राजा जनक समस्त द्वन्द्वोंसे रहित और जीवन्मुक्त पुरुष थे। उन्होंने मोक्षस्वरूप परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार कर लिया था। अनन्तं बत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किंचन । मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन ।। १९ ।। (उनकी वह गाथा इस प्रकार है—) दूसरोंकी दृष्टिमें मेरे पास बहुत धन है; परंतु उसमेंसे कुछ भी मेरा नहीं है। सारी मिथिलामें आग लग जाय तो भी मेरा कुछ नहीं जलेगा ।। १९ ।। प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोचन् शोचतो जनान् । जगतीस्थानिवाद्रिस्थो मन्दबुद्धीनवेक्षते ।। २० ।। जैसे पर्वतकी चोटीपर चढ़ा हुआ मनुष्य धरती-पर खड़े हुए प्राणियोंको केवल देखता है उनकी परिस्थितिसे प्रभावित नहीं होता, उसी प्रकार बुद्धिकी अट्टालिकापर चढ़ा हुआ

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