भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 128

का वाहं तव को मे त्वं कश्च ते मय्यनुग्रहः ॥ २१ ॥
'यदि यहाँ मुट्ठीभर जौकी आवश्यकता बनी ही रह गयी तो सब कुछ त्याग देनेकी जो आपने प्रतिज्ञा की थी, वह नष्ट हो गयी। (सर्वत्यागी हो जानेपर) मैं आपकी कौन हूँ और आप मेरे कौन हैं तथा आपका मुझपर अनुग्रह भी क्या है? ॥ २१ ॥
प्रशाधि पृथिवीं राजन् यदि तेऽनुग्रहो भवेत् ।
प्रासादं शयनं यानं वासांस्याभरणानि च ॥ २२ ॥
'राजन्! यदि आपका मुझपर अनुग्रह हो तो इस पृथिवीका शासन कीजिये और राजमहल, शय्या, सवारी, वस्त्र तथा आभूषणोंको भी उपयोगमें लाइये ॥ २२ ॥
श्रिया विहीनैरधनैस्त्यक्तमित्रैरकिंचनैः ।
सौखिकैः सम्भृतानर्थान् यः संत्यजति किं नु तत् ॥ २३ ॥
'श्रीहीन, निर्धन, मित्रोंद्वारा त्यागे हुए, अकिंचन एवं सुखकी अभिलाषा रखनेवाले लोगोंकी भाँति सब प्रकारसे परिपूर्ण राजलक्ष्मीका जो परित्याग करता है उससे उसे क्या लाभ? ॥ २३ ॥
योऽत्यन्तं प्रतिगृह्णीयाद् यश्च दद्यात् सदैव हि ।
तयोस्त्वमन्तरं विद्धि श्रेयांस्ताभ्यां क उच्यते ॥ २४ ॥
'जो बराबर दूसरोंसे दान लेता (भिक्षा ग्रहण करता) तथा जो निरन्तर स्वयं ही दान करता रहता है, उन दोनोंमें क्या अन्तर है और उनमेंसे किसको श्रेष्ठ कहा जाता है? यह आप समझिये ॥ २४ ॥
सदैव याचमानेषु तथा दम्भान्वितेषु च ।
एतेषु दक्षिणा दत्ता दावाग्नाविव दुर्हुतम् ॥ २५ ॥
'सदा ही याचना करनेवालेको और दम्भीको दी हुई दक्षिणा दावानलमें दी गयी आहुतिके समान व्यर्थ है ॥
जातवेदा यथा राजन् नादग्ध्वैवोपशाम्यति ।
सदैव याचमानो हि तथा शाम्यति न द्विजः ॥ २६ ॥
'राजन्! जैसे आग लकड़ीको जलाये बिना नहीं बुझती, उसी प्रकार सदा ही याचना करनेवाला ब्राह्मण (याचनाका अन्त किये बिना) कभी शान्त नहीं हो सकता ॥ २६ ॥
सतां वै ददतोऽन्नं च लोकेऽस्मिन् प्रकृतिर्ध्रुवा ।
न चेद् राजा भवेद् दाता कुतः स्युर्मोक्षकांक्षिणः ॥ २७ ॥
'इस संसारमें दाताका अन्न ही साधु पुरुषोंकी जीविकाका निश्चित आधार है। यदि दान करनेवाला राजा न हो तो मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले साधु-संन्यासी कैसे जी सकते हैं? ॥ २७ ॥
अन्नाद् गृहस्था लोकेऽस्मिन् भिक्षवस्तत एव च ।
अन्नात् प्राणः प्रभवति अन्नदः प्राणदो भवेत् ॥ २८ ॥