महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1338, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते । इत्येते द्वादशादित्याः कश्यपस्यात्मसम्भवाः ॥ १६ ॥ भग, अंश, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, महाबली विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु कहे गये हैं। ये बारह आदित्य हैं, जो कश्यप और अदितिके पुत्र हैं ॥ १५-१६ ॥
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि । मार्तण्डस्यात्मजावेतावष्टमस्य महात्मनः ॥ १७ ॥ नासत्य और दस्र—ये दोनों अश्विनीकुमार बताये गये हैं। ये दोनों अष्टम आदित्य महात्मा सूर्यके पुत्र हैं ॥
ते च पूर्वं सुराश्चेति द्विविधाः पितरः स्मृताः । त्वष्टुश्चैवात्मजः श्रीमान् विश्वरूपो महायशाः ॥ १८ ॥ ये तथा पूर्वोक्त देवता—दो प्रकारके पितर माने गये हैं। त्वष्टाके पुत्र महायशस्वी श्रीमान् विश्वरूप हुए ॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः । हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः ॥ १९ ॥ सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः । पूर्वमेव महाभागा वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ २० ॥ अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सुरेश्वर, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित—ये ग्यारह रुद्र हैं। महाभाग आठ वसुओंके नाम पहले ही बताये गये हैं ॥ १९-२० ॥
एत एवंविधा देवा मनोरेव प्रजापतेः । ते च पूर्वं सुराश्चेति द्विविधाः पितरः स्मृताः ॥ २१ ॥ इस प्रकार ये देवता प्रजापति मनुकी ही संतान हैं। वे तथा पूर्वोक्त देवता—ये दो प्रकारके पितर माने गये हैं ॥ २१ ॥
शीलयौवनतस्त्वन्यस्तथान्यः सिद्धसाध्ययोः । ऋभवो मरुतश्चैव देवानां चोदितो गणः ॥ २२ ॥ देवताओंमें एक वर्ग ऐसा है, जो सुन्दर शील-स्वभाव और अक्षय यौवनसे सम्पन्न है। दूसरा वर्ग सिद्धों और साध्योंका है। ऋभु और मरुत्—ये देवताओंके समुदायोंके नाम हैं ॥ २२ ॥
एवमेते समाम्नाता विश्वेदेवास्तथाश्विनौ । आदित्याः क्षत्रियास्तेषां विशश्च मरुतस्तथा ॥ २३ ॥ इसी प्रकार ये विश्वेदेव और अश्विनीकुमार भी देवताओंके गण माने गये हैं। इन देवताओंमें आदित्यगण क्षत्रिय और मरुद्गण वैश्य माने जाते हैं ॥ २३ ॥