महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरसातलमं जाकर भी भगवान् वाराहने देवद्रोही असुरोंको अपने खुरोंसे विदीर्ण कर दिया। उनके मांस, मेदा और हड्डियोंके ढेर लग गये थे ॥ २६ ॥ नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः। पद्मनाभो महायोगी भूताचार्यः स भूतराट् ॥ २७ ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंके आचार्य और स्वामी महायोगी वे भगवान् पद्मनाभ अपने महान् सिंहनादके कारण 'सनातन*' माने गये हैं ॥ २७ ॥ ततो देवगणाः सर्वे पितामहमुपाद्रवन् । तत्र गत्वा महात्मानमूचुश्चैव जगत्पतिम् ॥ २८ ॥ नादोऽयं कीदृशो देव नैतं विद्म वयं प्रभो। कोऽसौ हि कस्य वा नादो येन विह्वलितं जगत् ॥ २९ ॥ देवाश्च दानवाश्चैव मोहितास्तस्य तेजसा । उनके उस सिंहनादको सुनकर सब देवता जगदीश्वर भगवान् ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ पहुँचकर वे इस प्रकार बोले—'देव! प्रभो! यह कैसा सिंहनाद है? इसे हमलोग नहीं जानते। वह कौन वीर है? अथवा किसकी गर्जना है? जिसने इस जगत्को व्याकुल कर दिया है। देवता और दानव सभी उसके तेजसे मोहित हो रहे हैं' ॥ २८-२९ १/२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे विष्णुर्वाराहं रूपमास्थितः। उदतिष्ठन्महाबाहो स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ ३० ॥ महाबाहो! इसी बीचमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु जलसे ऊपर उठे। उस समय महर्षिगण उनकी स्तुति कर रहे थे ॥ ३० ॥
पितामह उवाच
निहत्य दानवपतीन् महावर्मा महाबलः। एष देवो महायोगी भूतात्मा भूतभावनः ॥ ३१ ॥ ब्रह्माजी बोले—देवताओ! ये महाकाय महाबली महायोगी भूतभावन भूतात्मा भगवान् विष्णु हैं, जो दानवराजोंका वध करके आ रहे हैं ॥ ३१ ॥ सर्वभूतेश्वरो योगी मुनिरात्मा तथाऽऽत्मनः । स्थिरीभवत कृष्णोऽयं सर्वविघ्नविनाशनः ॥ ३२ ॥ ये सम्पूर्ण भूतोंके ईश्वर, योगी, मुनि तथा आत्माके भी आत्मा हैं, ये ही समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाले श्रीकृष्ण हैं; अतः तुमलोग धैर्य धारण करो ॥ ३२ ॥ कृत्वा कर्मातिसाध्येतदशक्यममितप्रभः। समायातः स्वमात्मानं महाभागो महाद्युतिः ॥ ३३ ॥ अनन्त प्रभासे परिपूर्ण, महातेजस्वी एवं महान् सौभाग्यके आश्रयभूत ये भगवान् अत्यन्त उत्तम और दूसरोंके लिये असम्भव कार्य करके आ रहे हैं ॥ ३३ ॥