महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1353, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअतीन्द्रिय नमस्तुभ्यं लिङ्गैर्व्यक्तैर्न मीयसे । ये च त्वां नाभिजानन्ति संसारे संसरन्ति ते ॥ इन्द्रियातीत परमेश्वर! आपको नमस्कार है। व्यक्त लिंगोंद्वारा आपका ज्ञान होना असम्भव है। संसारमें जो आपको नहीं जानते, वे जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़े रहते हैं ॥
कामक्रोधविनिर्मुक्ता रागद्वेषविवर्जिताः । नान्यभक्ता विजानन्ति न पुनर्नारका द्विजाः ॥ जो काम और क्रोधसे मुक्त, राग-द्वेषसे रहित तथा आपके अनन्य भक्त हैं, वे ही आपको जान पाते हैं। जो विषयोंके नरकमें पड़े हुए द्विज हैं, वे आपको नहीं जानते हैं ॥
एकान्तिनो हि निर्द्वन्द्वा निराशीःकर्मकारिणः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणस्त्वां विशन्ति विनिश्चिताः ॥ जो आपके अनन्य भक्त, द्वन्द्वोंसे रहित तथा निष्काम कर्म करनेवाले हैं, जिन्होंने ज्ञानमयी अग्निसे अपने समस्त कर्मोंको दग्ध कर दिया है, वे आपके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाले पुरुष आपमें ही प्रवेश करते हैं ॥
अशरीरं शरीरस्थं समं सर्वेषु देहिषु । पुण्यपापविनिर्मुक्ता भक्तास्त्वां प्रविशन्त्युत ॥ आप शरीरमें रहते हुए भी उससे रहित हैं तथा सम्पूर्ण देहधारियोंमें समभावसे स्थित हैं। जो पुण्य और पापसे मुक्त हैं, वे भक्तजन आपमें ही प्रवेश करते हैं ॥
अव्यक्तं बुद्धयहङ्कारमनोभूतेन्द्रियाणि च । त्वयि तानि च तेषु त्वं न तेषु त्वं न ते त्वयि ॥ अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार, मन, पञ्च महाभूत तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ सभी आपमें हैं और उन सबमें आप हैं, किंतु वास्तवमें न उनमें आप हैं, न आपमें वे हैं ॥
एकत्वान्यत्वनानात्वं ये विदुर्यान्ति ते परम् । समोऽसि सर्वभूतेषु न ते द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ॥ समत्वमभिकांक्षेऽहं भक्त्या वै नान्यचेतसा । एकत्व, अन्यत्व और नानात्वका रहस्य जो लोग अच्छी तरह जानते हैं, वे आप परमात्माको प्राप्त होते हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंमें सम हैं। आपका न कोई द्वेषपात्र है और न प्रिय। मैं अनन्य चित्तसे आपकी भक्तिके द्वारा समत्व पाना चाहता हूँ ॥
चराचरमिदं सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। त्वया त्वय्येव तत् प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । चार प्रकारका जो यह चराचर प्राणिसमुदाय है, वह सब आपसे व्याप्त है। जैसे सूतमें मणियाँ पिरोये होते हैं, उसी प्रकार यह सारा जगत् आपमें ही ओत-प्रोत है ॥
स्रष्टा भोक्तासि कूटस्थो ह्यतस्तत्त्वस्तत्त्वसंज्ञितः ॥ अकर्महेतुरचलः पृथगात्मन्यवस्थितः ।