भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1354, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1354

आप जगत्के स्रष्टा, भोक्ता और कूटस्थ हैं। तत्त्वरूप होकर भी उससे सर्वथा विलक्षण हैं। आप कर्मके हेतु नहीं हैं। अविचल परमात्मा हैं। प्रत्येक शरीरमें पृथक्-पृथक् जीवात्मारूपसे आप ही विद्यमान हैं।। न ते भूतेषु संयोगो भूततत्त्वगुणातिगः ।। अहङ्कारेण बुद्ध्या वा न ते योगस्त्रिभिर्गुणैः । वास्तवमें प्राणियोंसे आपका संयोग नहीं है। आप भूत, तत्त्व और गुणोंसे परे हैं। अहंकार, बुद्धि और तीनों गुणोंसे आपका कोई सम्बन्ध नहीं है।। न ते धर्मोऽस्त्यधर्मो वा नारम्भो जन्म वा पुनः ।। जरामरणमोक्षार्थं त्वां प्रपन्नोऽस्मि सर्वशः । न आपका कोई धर्म है और न कोई अधर्म। न कोई आरम्भ है न जन्म। मैं जरा-मृत्युसे छुटकारा पानेके लिये सब प्रकारसे आपकी शरणमें आया हूँ।। ईश्वरोऽसि जगन्नाथ ततः परम उच्यसे ।। भक्तानां यद्धितं देव तद् ध्याहि त्रिदशेश्वर । जगन्नाथ! आप ईश्वर हैं, इसीलिये परमात्मा कहलाते हैं। देव! सुरेश्वर! भक्तोंके लिये जो हितकी बात हो, उसका मेरे लिये चिन्तन कीजिये।। विषयैरिन्द्रियैर्वापि न मे भूयः समागमः ।। पृथिवीं यातु मे घ्राणं यातु मे रसना जलम् । रूपं हुताशनं यातु स्पर्शो यातु च मारुतम् ।। श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनो वैकारिकं पुनः । विषयों और इन्द्रियोंके साथ फिर मेरा कभी समागम न हो। मेरी घ्राणेन्द्रिय पृथ्वी-तत्त्वमें मिल जाय और रसना जलमें, रूप (नेत्र) अग्निमें, स्पर्श (त्वचा) वायुमें, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमें और मन वैकारिक अहंकारमें मिल जाय।। इन्द्रियाण्यपि संयान्तु स्वासु स्वासु च योनिषु ।। पृथिवी यातु सलिलमापोऽग्निमनलोऽनिलम् । वायुराकाशमप्येतु मनश्चाकाश एव च ।। अहङ्कारं मनो यातु मोहनं सर्वदेहिनाम् । अहङ्कारस्ततो बुद्धिं बुद्धिरव्यक्तमच्युत ।। अच्युत! इन्द्रियाँ अपनी-अपनी योनियोंमें मिल जायें, पृथ्वी जलमें, जल अग्निमें, अग्नि वायुमें, वायु आकाशमें, आकाश मनमें, मन समस्त प्राणियोंको मोहनेवाले अहंकारमें, अहंकार बुद्धि (महत्तत्त्व)-में और बुद्धि अव्यक्त प्रकृतिमें मिल जाय।। प्रधाने प्रकृतिं याते गुणसाम्ये व्यवस्थिते । वियोगः सर्वकरणैर्गुणभूतैश्च मे भवेत् ।।