महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1388, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन इन्द्रियदेवताओंसे जिसका मन संयुक्त हो गया है, उसके अन्तःकरणमें परब्रह्म परमात्मा प्रकाशित हो उठता है; फिर धीरे-धीरे सत्त्वगुण प्राप्त होनेपर वह मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ २० ॥
अथवा न प्रवर्तेत योगतन्त्रैरुपक्रमेत् । येन तन्त्रयतस्तन्त्रं वृत्तिः स्यात् तत् तदाचरेत् ॥ २१ ॥ अथवा यदि पूर्वोक्तरूपसे उसके भीतर ब्रह्म प्रकाशित न हो तो वह योगी योगप्रधान उपायोंद्वारा अभ्यास आरम्भ करे। जिस हेतुसे योगाभ्यास करते हुए योगीकी ब्रह्ममें ही स्थिति हो, वह उसी-उसीका अनुष्ठान करे ॥ २१ ॥
कणकुल्माषपिण्याकशाकयावकसक्तवः । तथा मूलफलं भैक्ष्यं पर्यायेणोपयोजयेत् ॥ २२ ॥ अन्नके दाने, उड़द, तिलकी खली, साग, जौकी लप्सी, सत्तू, मूल और फल जो कुछ भी भिक्षामें मिल जाय, क्रमशः उसी अन्नसे योगी अपने जीवनका निर्वाह करे ॥ २२ ॥
आहारनियमं चैव देशे काले च सात्त्विकम् । तत् परीक्ष्यानुवर्तेत तत्प्रवृत्त्यनुपूर्वकम् ॥ २३ ॥ देश और कालके अनुसार सात्त्विक आहार ग्रहण करनेका नियम रखे। उस आहारके दोष-गुणकी परीक्षा करके यदि वह योगसिद्धिके अनुकूल हो तो उसे उपयोगमें ले ॥ २३ ॥
प्रवृत्तं नोपरुन्धेत शनैरग्निमिवेन्धयेत् । ज्ञानान्वितं तथा ज्ञानमर्कवत् सम्प्रकाशते ॥ २४ ॥ साधन आरम्भ कर देनेपर उसे बीचमें न रोके। जैसे आग धीरे-धीरे तेज की जाती है, उसी प्रकार ज्ञानके साधनको शनैः-शनैः उद्दीपित करे। ऐसा करनेसे ज्ञान सूर्यके समान प्रकाशित होने लगता है ॥
ज्ञानाधिष्ठानमज्ञानं त्रीँल्लोकानधितिष्ठति । विज्ञानानुगतं ज्ञानमज्ञानेनापकृष्यते ॥ २५ ॥ अज्ञानका अधिष्ठान भी ज्ञान ही है जो तीनों लोकोंमें व्याप्त है। अज्ञानके द्वारा विज्ञानयुक्त ज्ञानका ह्रास होता है ॥ २५ ॥
पृथक्त्वात् सम्प्रयोगाच्च नासूयेर्वेद शाश्वतम् । स तयोरपवर्गज्ञो वीतरागो विमुच्यते ॥ २६ ॥ शास्त्रोंमें कहीं जीवात्मा और परमात्माकी पृथक्ताका प्रतिपादन करनेवाले वचन उपलब्ध होते हैं और कहीं उनकी एकताका। यह परस्पर विरोध देखकर दोषदृष्टि न करते हुए सनातन ज्ञानको प्राप्त करे। जो उन दोनों प्रकारके वचनोंका तात्पर्य समझकर मोक्षके तत्त्वको जान लेता है, वह वीतराग पुरुष संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २६ ॥
ततो वीतजरामृत्युर्ज्ञात्वा ब्रह्म सनातनम् । अमृतं तदवाप्नोति यत् तदक्षरमव्ययम् ॥ २७ ॥