भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1396, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1396

गुणोंसे आवृत होता है ॥ १२ ॥ तस्माच्चतुष्टयं वेद्यमेतैर्हेतुभिरावृतम् । यथासंज्ञो ह्ययं सम्यगन्तकाले न मुह्यति ॥ १३ ॥ अतः इन्हीं हेतुओंसे आवृत हुई इन चार वस्तुओं (सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग, प्रकृति और पुरुष) को जानना चाहिये। इन्हें भलीभाँति तत्त्वसे जान लेनेपर मनुष्य मृत्युके समय मोहमें नहीं पड़ता है ॥ १३ ॥ श्रियं दिव्यमभिप्रेप्सुर्वर्ष्मवान् मनसा शुचिः । शारीरैर्नियमैरुग्रैश्चरेन्निष्कल्मषं तपः ॥ १४ ॥ जो दिव्य सम्पत्ति अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहे, उस देहधारी पुरुषको अपना मन शुद्ध रखना चाहिये और शरीरसे कठोर नियमोंका पालन करते हुए निर्दोष तपका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १४ ॥ त्रैलोक्यं तपसा व्याप्तमन्तर्भूतेन भास्वता । सूर्यश्च चन्द्रमाश्चैव भासतस्तपसा दिवि ॥ १५ ॥ आन्तरिक तप चैतन्यमय प्रकाशसे युक्त है। उसके द्वारा तीनों लोक व्याप्त हैं। आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा भी तपसे ही प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १५ ॥ प्रकाशस्तपसो ज्ञानं लोके संशब्दितं तपः । रजस्तमोघ्नं यत् कर्म तपसस्तत् स्वलक्षणम् ॥ १६ ॥ लोकमें तप शब्द विख्यात है। उस तपका फल है, ज्ञानस्वरूप प्रकाश। रजोगुण और तमोगुणका नाश करनेवाला जो निष्काम कर्म है, वही तपस्याका स्वरूपबोधक लक्षण है ॥ १६ ॥ ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते । वाङ्मनोनियमः सम्यङ्मानसं तप उच्यते ॥ १७ ॥ ब्रह्मचर्य और अहिंसाको शारीरिक तप कहते हैं। मन और वाणीका भलीभाँति किया हुआ संयम मानसिक तप कहलाता है ॥ १७ ॥ विधिज्ञेभ्यो द्विजातिभ्यो ग्राह्यमन्नं विशिष्यते । आहारनियमेनास्य पाप्मा शाम्यति राजसः ॥ १८ ॥ वैदिक विधिको जानने और उनके अनुसार चलनेवाले द्विजातियोंसे ही अन्न ग्रहण करना उत्तम माना गया है। ऐसे अन्नका नियमपूर्वक भोजन करनेसे रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाला पाप शान्त हो जाता है ॥ १८ ॥ वैमनस्यं च विषये यान्त्यस्य करणानि च । तस्मात् तन्मात्रमादद्याद् यावदत्र प्रयोजनम् ॥ १९ ॥ उससे साधककी इन्द्रियाँ भी विषयोंकी ओरसे विरक्त हो जाती हैं। इसलिये उतना ही अन्न ग्रहण करना चाहिये, जितना जीवन-रक्षाके लिये वाञ्छनीय

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