महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1423, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन
(युधिष्ठिर उवाच)
अस्ति कश्चिद् यदि विभो सदारो नियतो गृहे ।
अतीतसर्वसंसारः सर्वद्वन्द्वविवर्जितः ॥
तं मे ब्रूहि महाप्राज्ञ दुर्लभः पुरुषो महान् ।
**युधिष्ठिरने कहा—**महाप्राज्ञ! प्रभो! यदि कोई ऐसा पुरुष हो, जो गृहस्थ आश्रममें पत्नीसहित संयम-नियमके साथ रहता हो, समस्त सांसारिक बन्धनोंको पार कर चुका हो और सम्पूर्ण द्वन्द्वोंसे दूर रहकर उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करता हो तो उसका मुझे परिचय दीजिये, क्योंकि ऐसा महापुरुष दुर्लभ होता है ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन् यथावृत्तं यन्मां त्वं पृष्टवानसि ।
इतिहासमिमं शुद्धं संसारभयभेषजम् ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! तुमने मुझसे जो विषय पूछा है, उसे यथावत्रूपसे सुनो। यह विशुद्ध इतिहास जन्म-मरणरूप रोगका भय दूर करनेके लिये उत्तम औषध है ॥
देवलो नाम विप्रर्षिः सर्वशास्त्रार्थकोविदः ।
क्रियावान् धार्मिको नित्यं देवब्राह्मणपूजकः ॥
ब्रह्मर्षि देवलका नाम सर्वत्र प्रसिद्ध है। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण, क्रियानिष्ठ, धार्मिक तथा देवताओं और ब्राह्मणोंकी सदा पूजा करनेवाले थे ॥
सुता सुवर्चला नाम तस्य कल्याणलक्षणा ।
नातिह्रस्वा नातिकृशा नातिदीर्घा यशस्विनी ॥
उनके एक पुत्री थी, जो सुवर्चलाके नामसे पुकारी जाती थी। वह यशस्विनी कन्या सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी। वह न तो अधिक नाटी थी और न अधिक लंबी, वह विशेष दुबली भी नहीं थी ॥
प्रदानसमयं प्राप्ता पिता तस्य ह्यचिन्तयत् ॥