महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब उस अदृश्य आदि-महात्माने गम्भीर स्वरमें यह बात कही—'मुने! तुम्हारे न तो कान है, न मुख है, न हाथ है, न पैर है और न पैरोंके पंजे ही हैं'॥ ब्रुवन् मुनीन् सत्यमथो निरीक्ष्य स्वमाह विद्वान् मनसा निगम्य । ऋषे कथं वाक्यमिदं ब्रवीषि न चास्य मन्ता न च विद्यते चेत् ॥ न शुश्रुवुस्ततस्तत् तु प्रतिवाक्यं द्विजोत्तमाः । निरीक्ष्यमाणा आकाशं प्रहसन्तस्ततस्ततः ॥ मुनियोंसे बातचीत करते हुए विद्वान् विभाण्डकने अपने विषयमें जब यह सब सत्य देखा तो मन-ही-मन विचार करके कहा—'ऋषे! आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? यदि इसको जाननेवाला या न जाननेवाला कोई न रहे, तब क्या होगा?' परंतु इसका उत्तर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फिर नहीं सुनायी दिया। वे हँसते हुए आकाशकी ओर देखते ही रह गये ॥ आश्चर्यमिति मत्वा ते ययुर्हैमं महागिरिम् । सनत्कुमारसंकाशं सगणा मुनिसत्तमाः ॥ 'यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है' ऐसा मानकर वे सभी मुनिश्रेष्ठ दल-बलसहित सुवर्णमय महागिरि मेरुपर सनत्कुमारजीके पास गये ॥ तं पर्वतं समारुह्य ददृशुर्ध्यानमाश्रिताः । कुमारं देवमर्हन्तं वेदपाराविवर्जितम् ॥ उस पर्वतपर आरूढ़ हो ध्यानका आश्रय ले उन ऋषियोंने पूजनीय देव सनत्कुमारको देखा, जो निरन्तर वेदके पारायणमें लगे हुए थे ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे प्रकृतिस्थं महामुनिम् । सनत्कुमारं राजेन्द्र प्रणिपत्य द्विजाः स्थिताः ॥ आगतान् भगवानाह ज्ञाननिर्धूतकल्मषः । ज्ञातं मया मुनिगणा वाक्यं तदशरीरिणः ॥ कार्यमद्य यथाकामं पृच्छध्वं मुनिपुङ्गवाः । राजेन्द्र! एक वर्ष पूर्ण होनेपर जब महामुनि सनत्कुमार प्रकृतिस्थ हुए, तब वे ब्राह्मण उन्हें प्रणाम करके खड़े हो गये। ज्ञानसे जिनके सारे पाप धुल गये थे, उन भगवान् सनत्कुमारने वहाँ पधारे हुए ऋषियोंसे कहा—'मुनिगण! अदृश्य देवताने जो बात कही है, वह मुझे ज्ञात है; अतः आज आपलोगोंके प्रश्नोंका उत्तर देना है। मुनिवरो! आप इच्छानुसार प्रश्न करें'॥ तमब्रुवन् प्राञ्जलयो महामुनिं द्विजोत्तमं ज्ञाननिधिं सुनिर्मलम् । कथं वयं ज्ञाननिधिं वरेण्यं