भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1452, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1452

है ।।

यथा वायुरेकः सन् बहुधेरितः । यथावद् द्विजे मृगे व्याघ्रे च । मनुजे वेणुसंश्रयो भिद्यते वायुरथैकः । आत्मा तथासौ परमात्मासावन्य इव भाति । जैसे वायु एक होकर भी अनेक रूपोंमें संचरित होता है। पक्षी, मृग, व्याघ्र और मनुष्यमें तथा वेणुमें यथार्थ रूपसे स्थित होकर एक ही वायुके भिन्न-भिन्न स्वरूप हो जाते हैं। जो आत्मा है वही परमात्मा है; परंतु वह जीवात्मासे भिन्न-सा जान पड़ता है ।।

एवमात्मा स एव गच्छति । सर्वमात्मा पश्यन् शृणोति जिघ्रति भाषते । इस प्रकार वह आत्मा ही परमात्मा है। वही जाता है, वह आत्मा ही सबको देखता है, सबकी बातें सुनता है, सभी गंधोंको सूँघता है और सबसे बातचीत करता है ।।

चक्रेऽस्य तं महात्मानं परितो दश रश्मयः । विनिष्क्रम्य यथासूर्यमनुगच्छति तं प्रभुम् ।। सूर्यदेवके चक्रमें सब ओर दस-दस किरणें हैं, जो वहाँसे निकलकर महात्मा भगवान् सूर्यके पीछे-पीछे चलती हैं ।।

दिने दिनेऽस्तमभ्येति पुनरुद्गच्छते दिशः । तावुभौ न रवौ चास्तां तथा वित्त शरीरिणम् ।। सूर्यदेव प्रतिदिन अस्त होते और पुनः पूर्वदिशामें उदित होते हैं; परंतु वे उदय और अस्त दोनों ही सूर्यमें नहीं हैं। इसी प्रकार शरीरके अन्तर्गत अन्तर्यामीरूपसे जो भगवान् नारायण विराजमान हैं, उनको जानो (उनमें शरीर और अशरीरभाव सूर्यमें उदय-अस्तकी ही भाँति कल्पित हैं) ।।

पतिते वित्त विप्रेन्द्रा भक्षणे चरणे परः । ऊर्ध्वमेकस्तथाधस्तादेकस्तिष्ठति चापरः ।। विप्रवरो! आपलोगोंको गिरते-पड़ते, चलते-फिरते और खाते-पीते प्रत्येक कार्यके समय, ऊपर-नीचे आदि प्रत्येक देश और दिशामें एकमात्र भगवान् नारायण सर्वत्र विराज रहे हैं—ऐसा अनुभव करना चाहिये ।।

हिरण्यसदनं ज्ञेयं समेत्य परमं पदम् । आत्मना ह्यात्मदीपं तमात्मनि ह्यात्मपूरुषम् ।। उनका दिव्य सुवर्णमय धाम ही परमपद जानना चाहिये, उसे पाकर जीवन कृतार्थ हो जाता है। वह स्वयं ही अपना प्रकाशक और स्वयं ही अपने-आपमें अन्तर्यामी आत्मा है ।।

संचितं संचितं पूर्वं भ्रमरो वर्तते भ्रमन् । योऽभिमानीव जानाति न मुह्यति न हीयते ।। भौंरा पहले रसका संचय कर लेता है तब फूलके चारों ओर चक्कर लगाने लगता है, उसी प्रकार जो ज्ञानी पुरुष देहाभिमानी-जैसा बनकर लोकसंग्रहके लिये सब विषयोंका अनुभव करता है वह न तो मोहमें पड़ता है और न क्षीण ही होता है ।।

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