भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1453

न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनं हृदा मनीषा पश्यति रूपमस्य । इज्यते यस्तु मन्त्रेण यजमानो द्विजोत्तमः ॥ कोई भी उस परमात्माको अपने चर्मचक्षुओंसे नहीं देख सकता। अन्तःकरणमें स्थित निर्मल बुद्धिके द्वारा ही उसके रूपको ज्ञानी पुरुष देख पाता है। उस परमात्माका मन्त्रद्वारा यजन किया जाता है तथा श्रेष्ठ द्विज ही उसका यजन करता है ।।

नैव धर्मी न चाधर्मी द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । ज्ञानतृप्तः सुखं शेते ह्यमृतात्मा न संशयः ॥ वह अमृतस्वरूप परमात्मा न धर्मी है, न अधर्मी। वह द्वन्द्वोंसे अतीत और ईर्ष्या-द्वेषसे शून्य है। इसमें संदेह नहीं कि वह ज्ञानसे परितृप्त होकर सुखपूर्वक सोता है ।।

एवमेष जगत्सृष्टिं कुरुते मायया प्रभुः । न जानाति विमूढात्मा कारणं चात्मनो ह्यसौ ॥ तथा ये भगवान् अपनी मायाद्वारा जगत्की सृष्टि करते हैं। जिसका हृदय मोहसे आच्छन्न है वह अपने कारणभूत परमात्माको नहीं जानता ।।

ध्याता द्रष्टा तथा मन्ता बोद्धा दृष्टान् स एव सः । को विद्वान् परमात्मानमनन्तं लोकभावनम् ॥ यत्तु शक्यं मया प्रोक्तं गच्छध्वं मुनिपुङ्गवाः । वही ध्यान, दर्शन, मनन और देखी हुई वस्तुओंका बोध प्राप्त करनेवाला है। सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति करनेवाले उस अनन्त परमात्माको कौन जान सकता है? मुनिवरो! मुझसे जहाँतक हो सकता था मैंने इसका स्वरूप बता दिया। अब आपलोग जाइये ।।

भीष्म उवाच

एवं प्रणम्य विप्रेन्द्रा ज्ञानसागरसम्भवम् । सनत्कुमारं संदृश्य जग्मुस्ते रुचिरं पुनः ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार ज्ञानके समुद्रकी उत्पत्तिके कारणभूत मनोहर आकृतिवाले सनत्कुमारको प्रणाम करके उनका दर्शन करनेके पश्चात् वे सब ऋषि-मुनि वहाँसे चले गये ।।

तस्मात् त्वमपि कौन्तेय ज्ञानयोगपरो भव । ज्ञानमेव महाराज सर्वदुःखविनाशनम् ॥ अतः महाराज कुन्तीनन्दन! तुम भी ज्ञानयोगके साधनमें तत्पर हो जाओ। ऐसा ज्ञान ही सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाला है ।।

इदं महादुःखसमाकराणां नृणां परित्राणविनिर्मितं पुरा ।