महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1455, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रह्लादजीके मनमें किसी विषयके प्रति आसक्ति नहीं थी। उनके सारे पाप धुल गये थे। वे कुलीन और बहुश्रुत विद्वान् थे। वे गर्व और अहंकारसे रहित थे। वे धर्मकी मर्यादाके पालनमें तत्पर और शुद्ध सत्त्वगुणमें स्थित रहते थे। निन्दा और स्तुतिको समान समझते, मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखते और एकान्त स्थानमें निवास करते थे। उन्हें चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाशका ज्ञान था। अप्रियकी प्राप्तिमें क्रोधयुक्त तथा प्रियकी प्राप्ति होनेपर हर्षयुक्त नहीं होते थे। मिट्टीके ढेले और सुवर्ण दोनोंमें उनकी समानदृष्टि थी। वे ज्ञानस्वरूप कल्याणमय परमात्माके ध्यानमें स्थित और धीर थे। उन्हें परमात्मतत्त्वका पूर्ण निश्चय हो गया था। उन्हें परावरस्वरूप ब्रह्मका पूर्ण ज्ञान था। वे सर्वज्ञ, सम्पूर्णभूत-प्राणियोंमें समदर्शी एवं जितेन्द्रिय थे। वे भगवान् नारायणके प्रिय भक्त और सदा उन्हींके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले थे। हिरण्यकशिपुनन्दन प्रह्लादजीको एकान्तमें बैठकर परमात्मा श्रीहरिका ध्यान करते देख इन्द्र उनकी बुद्धि और विचारको जाननेकी इच्छासे उनके निकट जाकर इस प्रकार बोले— ॥ ४-८ ॥
यैः कश्चित् सम्मतो लोके गुणैः स्यात् पुरुषो नृषु । भवत्यनपगान् सर्वान्स्तान् गुणाँल्लक्षयामहे ॥ ९ ॥ ‘दैत्यराज! संसारमें जिन गुणोंको पाकर कोई भी पुरुष सम्मानित हो सकता है, उन सबको मैं आपके भीतर स्थिरभावसे स्थित देखता हूँ ॥ ९ ॥
अथ ते लक्ष्यते बुद्धिः समा बालजनैरिव । आत्मानं मन्यमानः सन् श्रेयः किमिह मन्यसे ॥ १० ॥ ‘आपकी बुद्धि बालकोंके समान राग-द्वेषसे रहित दिखायी देती है। आप आत्माका अनुभव करते हैं, इसीलिये आपकी ऐसी स्थिति है; अतः मैं पूछता हूँ कि इस जगत्में आप किसको आत्मज्ञानका सर्वश्रेष्ठ साधन मानते हैं? ॥ १० ॥
बद्धः पाशैश्च्युतः स्थानाद् द्विषतां वशमागतः । श्रिया विहीनः प्रह्राद शोचितव्ये न शोचसि ॥ ११ ॥ ‘आप रस्सियोंसे बाँधे गये, अपने राज्यसे भ्रष्ट हुए और शत्रुओंके वशमें पड़ गये थे। आप अपनी राज्यलक्ष्मीसे वंचित हो गये। प्रह्लादजी! ऐसी शोचनीय स्थितिमें पड़ जानेपर भी आप शोक नहीं कर रहे हैं? ॥
प्रज्ञालाभात् तु दैतेय उताहो धृतिमत्तया । प्रह्राद सुस्थरूपोऽसि पश्यन् व्यसनमात्मनः ॥ १२ ॥ ‘प्रह्लादजी! आप अपने ऊपर संकट आया देखकर भी निश्चिन्त कैसे हैं? दैत्यराज! आपकी यह स्थिति आत्मज्ञानके कारण है या धैर्यके कारण?’ ॥ १२ ॥
इति संचोदितस्तेन धीरो निश्चितनिश्चयः । उवाच श्लक्ष्णया वाचा स्वां प्रज्ञामनुवर्णयन् ॥ १३ ॥