महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1456, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर परमात्मतत्त्वको निश्चितरूपसे जाननेवाले धीरबुद्धि प्रह्लादजीने अपने ज्ञानका वर्णन करते हुए मधुर वाणीमें कहा ॥ १३ ॥
प्रह्लाद उवाच
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च भूतानां यो न बुद्ध्यते । तस्य स्तम्भो भवेद् बाल्यान्नास्ति स्तम्भोऽनुपश्यतः ॥ १४ ॥ प्रह्लादजी बोले—देवराज! जो प्राणियोंकी प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानता, उसीको अविवेकके कारण स्तम्भ (जडता या मोह) होता है। जिसे आत्माका साक्षात्कार हो गया है, उसको कभी मोह नहीं होता ॥
स्वभावात् सम्प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते तथैव च । सर्वे भावास्तथाभावाः पुरुषार्थो न विद्यते ॥ १५ ॥ सब तरहके भाव और अभाव स्वभावसे ही आते-जाते रहते हैं। उसके लिये पुरुषका कोई प्रयत्न नहीं होता ॥ १५ ॥
पुरुषार्थस्य चाभावे नास्ति कश्चिच्च कारकः । स्वयं न कुर्वतस्तस्य जातु मानो भवेदिह ॥ १६ ॥ पुरुषका प्रयत्न न होनेसे कोई पुरुष कर्ता नहीं हो सकता; परंतु स्वयं कभी न करते हुए भी उसे इस जगत्में कर्तापनका अभिमान हो जाता है ॥ १६ ॥
यस्तु कर्तारमात्मानं मन्यते साध्वसाधु वा । तस्य दोषवती प्रज्ञा अतत्त्वज्ञेति मे मतिः ॥ १७ ॥ जो आत्माको शुभ या अशुभ कर्मोंका कर्ता मानता है, उसकी बुद्धि दोषसे युक्त और तत्त्वज्ञानसे रहित है—ऐसी मेरी मान्यता है ॥ १७ ॥
यदि स्यात् पुरुषः कर्ता शक्रात्मश्रेयसे ध्रुवम् । आरम्भास्तस्य सिद्ध्येयुर्न तु जातु परा भवेत् ॥ १८ ॥ इन्द्र! यदि पुरुष ही कर्ता होता तो वह अपने कल्याणके लिये जो कुछ भी करता, उसके भी सारे कार्य अवश्य सिद्ध होते। उसे अपने प्रयत्नमें कभी पराभव नहीं प्राप्त होता ॥ १८ ॥
अनिष्टस्य हि निर्वृत्तिरनिर्वृत्तिः प्रियस्य च । लक्ष्यते यतमानानां पुरुषार्थस्ततः कुतः ॥ १९ ॥ परंतु देखा यह जाता है कि इष्टसिद्धिके लिये प्रयत्न करनेवालोंको अनिष्टकी भी प्राप्ति होती है और इष्टकी सिद्धिसे वे वंचित रह जाते हैं; अतः पुरुषार्थकी प्रधानता कहाँ रही? ॥ १९ ॥
अनिष्टस्याभिनिर्वृत्तिमिष्टसंवृत्तिमेव च । अप्रयत्नेन पश्यामः केषाञ्चित् तत्स्वभावतः ॥ २० ॥