महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस गत्वा भ्रातरं शंखमार्तरूपोऽब्रवीदिदम् ।
धृतदण्डस्य दुर्बुद्धेर्भावांस्तत् क्षन्तुमर्हति ॥ ३७ ॥
अपने भाई शंखके पास जाकर लिखितने आर्त होकर कहा—‘भैया! मैंने दण्ड पा लिया। मुझ दुर्बुद्धिके उस अपराधको आप क्षमा कर दें’ ॥ ३७ ॥
शंख उवाच
न कुप्ये तव धर्मज्ञ न त्वं दूषयसे मम ।
सुनिर्मलं कुलं ब्रह्मन्नस्मिन् जगति विश्रुतम् ।
धर्मस्तु ते व्यतिक्रान्तस्ततस्ते निष्कृतिः कृता ॥ ३८ ॥
शंख बोले—धर्मज्ञ! मैं तुमपर कुपित नहीं हूँ। तुम मेरा कोई अपराध नहीं करते हो। ब्रह्मन्! हम दोनोंका कुल इस जगत्में अत्यन्त निर्मल एवं निष्कलंक रूपमें विख्यात है। तुमने धर्मका उल्लंघन किया था, अतः उसीका प्रायश्चित्त किया है ॥ ३८ ॥
त्वं गत्वा बाहुदां शीघ्रं तर्पयस्व यथाविधि ।
देवानृषीन् पितॄंश्चैवं मा चाधर्मे मनः कृथाः ॥ ३९ ॥
अब तुम शीघ्र ही बाहुदा नदीके तटपर जाकर विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करो। भविष्यमें फिर कभी अधर्मकी ओर मन न ले जाना ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शंखस्य लिखितस्तदा ।
अवगाह्यापगां पुण्यामुदकार्थं प्रचक्रमे ॥ ४० ॥
प्रादुरास्तां ततस्तस्य करौ जलजसंनिभौ ।
शंखकी वह बात सुनकर लिखितने उस समय पवित्र नदी बाहुदामें स्नान किया और पितरोंका तर्पण करनेके लिये चेष्टा आरम्भ की। इतनेहीमें उनके कमल-सदृश सुन्दर दो हाथ प्रकट हो गये ॥ ४० १/२ ॥
ततः स विस्मितो भ्रातुर्दर्शयामास तौ करौ ॥ ४१ ॥
ततस्तमब्रवीच्छंखस्तपसेदं कृतं मया ।
मा च तेऽत्र विशंकाभूद् दैवमत्र विधीयते ॥ ४२ ॥
तदनन्तर लिखितने चकित होकर अपने भाईको वे दोनों हाथ दिखाये। तब शंखने उनसे कहा—‘भाई! इस विषयमें तुम्हें शंका नहीं होनी चाहिये। मैंने तपस्यासे तुम्हारे हाथ उत्पन्न किये हैं। यहाँ दैवका विधान ही सफल हुआ है ॥ ४१-४२ ॥
लिखित उवाच
किं तु नाहं त्वया पूतः पूर्वमेव महाद्युते ।
यस्य ते तपसो वीर्यमीदृशं द्विजसत्तम ॥ ४३ ॥
तब लिखितने पूछा—महातेजस्वी द्विजश्रेष्ठ! जब आपकी तपस्याका ऐसा बल है तो आपने पहले ही मुझे पवित्र क्यों नहीं कर दिया? ॥ ४३ ॥