महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन
वैशम्पायन उवाच
अस्मिन्नेव प्रकरणे धनंजयमुदारधीः । अभिनीततरं वाक्यमित्युवाच युधिष्ठिरः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी प्रसंगमें उदारबुद्धि राजा युधिष्ठिरने अर्जुनसे यह युक्तियुक्त बात कही ॥ १ ॥
यदेतन्मन्यसे पार्थ न ज्यायोऽस्ति धनादिति । न स्वर्गो न सुखं नार्थो निर्धनस्येति तन्मृषा ॥ २ ॥ ‘पार्थ! तुम जो यह समझते हो कि धनसे बढ़कर कोई वस्तु नहीं है तथा निर्धनको स्वर्ग, सुख और अर्थकी भी प्राप्ति नहीं हो सकती, यह ठीक नहीं है ॥ २ ॥
स्वाध्याययज्ञसंसिद्धा दृश्यन्ते बहवो जनाः । तपोरताश्च मुनयो येषां लोकाः सनातनाः ॥ ३ ॥ ‘बहुत-से मनुष्य केवल स्वाध्याययज्ञ करके सिद्धिको प्राप्त हुए देखे जाते हैं। तपस्यामें लगे हुए बहुतेरे मुनि ऐसे हो गये हैं, जिन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति हुई है ॥ ३ ॥
ऋषीणां समयं शश्वद् ये रक्षन्ति धनंजय । आश्रिताः सर्वधर्मज्ञा देवास्तान् ब्राह्मणान् विदुः ॥ ४ ॥ ‘धनंजय! सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले जो लोग ब्रह्मचर्य-आश्रममें स्थित हो ऋषियोंकी स्वाध्याय-परम्पराकी सदैव रक्षा करते हैं, देवता उन्हें ही ब्राह्मण मानते हैं ॥
स्वाध्यायनिष्ठान् हि ऋषीन् ज्ञाननिष्ठांस्तथापरान् । बुद्ध्येथाः संततं चापि धर्मनिष्ठान् धनंजय ॥ ५ ॥ ‘अर्जुन! तुम्हें सदा यह समझना चाहिये कि ऋषियोंमेंसे कुछ लोग वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें ही तत्पर रहते हैं, कुछ ज्ञानोपार्जनमें संलग्न होते हैं और कुछ लोग धर्म-पालनमें ही निष्ठा रखते हैं ॥ ५ ॥
ज्ञाननिष्ठेषु कार्याणि प्रतिष्ठाप्यानि पाण्डव । वैखानसानां वचनं यथा नो विदितं प्रभो ॥ ६ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! प्रभो! वानप्रस्थोंके वचनको जैसा हमने समझा है, उसके अनुसार ज्ञाननिष्ठ महात्माओंको ही राज्यके सारे कार्य सौंपने चाहिये ॥ ६ ॥
अजाश्च पृश्नयश्चैव सिकताश्चैव भारत । अरुणाः केतवश्चैव स्वाध्यायेन दिवं गताः ॥ ७ ॥