महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तविंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना
युधिष्ठिर उवाच
अभिमन्यौ हते बाले द्रौपद्यास्तनयेषु च ।
धृष्टद्युम्ने विराटे च द्रुपदे च महीपतौ ॥ १ ॥
वृषसेने च धर्मज्ञे धृष्टकेतौ तु पार्थिवे ।
तथान्येषु नरेन्द्रेषु नानादेश्येषु संयुगे ॥ २ ॥
न च मुञ्चति मां शोको ज्ञातिघातिनमातुरम् ।
राज्यकामुकमत्युग्रं स्ववंशोच्छेदकारिणम् ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने व्यासजीसे कहा—**मुनिश्रेष्ठ! इस युद्धमें बालक अभिमन्यु, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, धृष्टद्युम्न, विराट, राजा द्रुपद, धर्मज्ञ वृषसेन, चेदिराज धृष्टकेतु तथा नाना देशोंके निवासी अन्यान्य नरेश भी वीरगतिको प्राप्त हुए हैं। मैं जाति-भाइयोंका घातक, राज्यका लोभी, अत्यन्त क्रूर और अपने वंशका विनाश करनेवाला निकला, यही सब सोचकर मुझे शोक नहीं छोड़ रहा है और मैं अत्यन्त आतुर हो रहा हूँ ॥ १—३ ॥
यस्यांके क्रीडमानेन मया वै परिवर्तितम् ।
स मया राज्यलुब्धेन गांगेयो युधि पातितः ॥ ४ ॥
जिनकी गोदमें खेलता हुआ मैं लोटपोट हो जाता था, उन्हीं पितामह गंगानन्दन भीष्मजीको मैंने राज्यके लोभसे मरवा डाला ॥ ४ ॥
यदा ह्येनं विघूर्णन्तमपश्यं पार्थसायकैः ।
कम्पमानं यथा वज्रैः प्रेक्ष्यमाणं शिखण्डिना ॥ ५ ॥
जीर्णसिंहमिव प्रांशुं नरसिंहं पितामहम् ।
कीर्यमाणं शरैर्दृष्ट्वा भृशं मे व्यथितं मनः ॥ ६ ॥
जब मैंने देखा कि अर्जुनके वज्रोपम बाणोंसे आहत हो बूढ़े सिंहके समान मेरे उन्नतकाय पुरुषसिंह पितामह कम्पित हो रहे हैं और उन्हें चक्कर-सा आने लगा है, शिखण्डी उनकी ओर देख रहा है और उनका सारा शरीर बाणोंसे खचाखच भर गया है तो यह सब देखकर मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ५-६ ॥
प्राङ्मुखं सीदमानं च रथे पररथारुजम् ।
घूर्णमानं यथा शैलं तदा मे कश्मलोऽभवत् ॥ ७ ॥