महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1814, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंशेषस्य चैवाथ नरस्य चैव देवस्य विष्णोः परमस्य चैव ॥ ५० ॥
'फिर वह योगी भू आदि सात लोकोंको विनाशशील क्षणभंगुर समझकर पुनः मनुष्यलोकमें भलीभाँति (शोक-मोहसे रहित होकर) निवास करता है। तदनन्तर शरीरका अन्त होनेपर वह अव्यय (अविनाशी या निर्विकार) एवं अनन्त (देश, काल और वस्तुकृत परिच्छेदसे शून्य) स्थान (परब्रह्मपद) को प्राप्त होता है। वह अव्यय एवं अनन्त स्थान किसीके मतमें महादेवजीका कैलाशधाम है। किसीके मतमें भगवान् विष्णुका वैकुण्ठधाम है। किसीके मतमें ब्रह्माजीका सत्यलोक है। कोई-कोई उसे भगवान् शेष या अनन्तका धाम बताते हैं। कोई वह जीवका ही परमधाम है—ऐसा कहते हैं और कोई-कोई उसे सर्वव्यापी चिन्मय प्रकाशसे युक्त परब्रह्मका स्वरूप बताते हैं ॥ ५० ॥
संहारकाले परिदग्धकाया ब्रह्माणमायान्ति सदा प्रजा हि । चेष्टात्मनो देवगणाश्च सर्वे ये ब्रह्मलोकादपराः स्म तेऽपि ॥ ५१ ॥
'ज्ञानाग्निके द्वारा जिनके सूक्ष्म, स्थूल और कारण-शरीर दग्ध हो गये हैं, वे प्रजाजन अर्थात् योगीलोग प्रलयकालमें सदा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं एवं जो ब्रह्मलोकसे नीचेके लोकोंमें रहनेवाले साधनशील दैवी प्रकृतिसे सम्पन्न साधक हैं, वे सब परब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ५१ ॥
प्रजाविसर्गं तु सशेषकाले स्थानानि स्वान्येव सरन्ति जीवाः । निःशेषतस्तत्पदं यान्ति चान्ते सर्वे देवा ये सदृशा मनुष्याः ॥ ५२ ॥
'प्रलयकालमें जो जीव देवभावको प्राप्त थे, वे यदि अपने सम्पूर्ण कर्मफलोंका उपभोग समाप्त करनेसे पहले ही लयको प्राप्त हो जाते हैं तो कल्पान्तरमें पुनः प्रजाकी सृष्टि होनेपर वे शेष फलका उपभोग करनेके लिये उन्हीं स्थानोंको प्राप्त होते हैं, जो उन्हें पूर्वकल्पमें प्राप्त थे; किंतु जो कल्पान्तमें उस योनिसम्बन्धी कर्मफल-भोगको पूर्ण कर चुके हैं, वे स्वर्गलोकका नाश हो जानेपर दूसरे कल्पमें उनके जैसे कर्म हैं, उसीके सदृश अन्य प्राणियोंकी भाँति मनुष्य-योनिको ही प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥
ये तु च्युताः सिद्धलोकात् क्रमेण तेषां गतिं यान्ति तथाऽऽनुपूर्व्या । जीवाः परे तद्गततुल्यरूपाः स्वं स्वं विधिं यान्ति विपर्ययेण ॥ ५३ ॥