भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1822

देवासुरैस्ततः सैन्यैः सर्वमासीत् समाकुलम् ॥ १५ ॥ उस समय तलवार, पट्टिश, त्रिशूल, शक्ति, तोमर, मुद्गर, नाना प्रकारकी शिला, भयानक टंकार करनेवाले धनुष, अनेक प्रकारके दिव्य अस्त्र-शस्त्र तथा आगकी ज्वालाओंसे एवं देवताओं और असुरोंकी सेनाओंसे यह सारा आकाश व्याप्त हो गया ॥ १४-१५ ॥ पितामहपुरोगाश्च सर्वे देवगणास्तथा । ऋषयश्च महाभागास्तद् युद्धं द्रष्टुमागमन् ॥ १६ ॥ विमानाग्र्यैर्महाराज सिद्धाश्च भरतर्षभ । गन्धर्वाश्च विमानाग्र्यैरप्सरोभिः समागमन् ॥ १७ ॥ भरतभूषण महाराज! ब्रह्मा आदि समस्त देवता, महाभाग ऋषि, सिद्धगण तथा अप्सराओंसहित गन्धर्व—ये सबके सब श्रेष्ठ विमानोंपर आरूढ़ हो उस अद्भुत युद्धका दृश्य देखनेके लिये वहाँ आ गये थे ॥ १६-१७ ॥ ततोऽन्तरिक्षमावृत्य वृत्रो धर्मभृतां वरः । अश्मवर्षेण देवेन्द्रं समाकिरदतिद्रुतम् ॥ १८ ॥ तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वृत्रासुरने आकाशको घेरकर बड़ी उतावलीके साथ देवराज इन्द्रपर पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १८ ॥ ततो देवगणाः क्रुद्धाः सर्वतः शरवृष्टिभिः । अश्मवर्षमपोहन्त वृत्रप्रेरितमाहवे ॥ १९ ॥ यह देख देवगण कुपित हो उठे। उन्होंने युद्धमें सब ओरसे बाणोंकी वर्षा करके वृत्रासुरके चलाये हुए पत्थरोंकी वर्षाको नष्ट कर दिया ॥ १९ ॥ वृत्रस्तु कुरुशार्दूल महामायो महाबलः । मोहयामास देवेन्द्रं मायायुद्धेन सर्वशः ॥ २० ॥ तस्य वृत्रार्दितस्याथ मोह आसीच्छतक्रतोः । रथन्तरेण तं तत्र वसिष्ठः समबोधयत् ॥ २१ ॥ कुरुश्रेष्ठ! महामायावी महाबली वृत्रासुरने सब ओरसे मायामय युद्ध छेड़कर देवराज इन्द्रको मोहमें डाल दिया। वृत्रासुरसे पीड़ित हुए इन्द्रपर मोह छा गया। तब वसिष्ठजीने रथन्तर सामद्वारा वहाँ इन्द्रको सचेत किया ॥ २०-२१ ॥

वसिष्ठ उवाच

देवश्रेष्ठोऽसि देवेन्द्र दैत्यासुरनिबर्हण । त्रैलोक्यबलसंयुक्तः कस्माच्छक्र विषीदसि ॥ २२ ॥ वसिष्ठजीने कहा—देवेन्द्र! तुम सब देवताओंमें श्रेष्ठ हो। दैत्यों तथा असुरोंका संहार करनेवाले शक्र! तुम तो त्रिलोकीके बलसे सम्पन्न हो; फिर इस प्रकार विषादमें क्यों पड़े