महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1824, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर अंगिराके पुत्र श्रीमान् बृहस्पति तथा बड़े-बड़े महर्षियोंने जब वृत्रासुरका पराक्रम देखा, तब महादेवजीके पास आकर लोकहितकी कामनासे वृत्रासुरके विनाशके लिये उनसे निवेदन किया ।। २९ १/२ ।। ततो भगवतस्तेजो ज्वरो भूत्वा जगत्पतेः ।। ३० ।। समाविशत् तदा रौद्रो वृत्रं लोकपतिं तदा । तब जगदीश्वर भगवान् शिवका तेज रौद्र ज्वर होकर लोकेश्वर वृत्रके शरीरमें समा गया ।। ३० १/२ ।। विष्णुश्च भगवान् देवः सर्वलोकाभिपूजितः ।। ३१ ।। ऐन्द्रं समाविशद् वज्रं लोकसंरक्षणे रतः । फिर लोकरक्षापरायण सर्वलोकपूजित देवेश्वर भगवान् विष्णुने भी इन्द्रके वज्रमें प्रवेश किया ।। ३१ १/२ ।। ततो बृहस्पतिर्धीमानुपागम्य शतक्रतुम् । वसिष्ठश्च महातेजाः सर्वे च परमर्षयः ।। ३२ ।। ते समासाद्य वरदं वासवं लोकपूजितम् । ऊचुरेकाग्रमनसो जहि वृत्रमिति प्रभो ।। ३३ ।। तत्पश्चात् बुद्धिमान् बृहस्पति, महातेस्वी वसिष्ठ तथा सम्पूर्ण महर्षि वरदायक, लोकपूजित शतक्रतु इन्द्रके पास जाकर एकाग्रचित्त हो इस प्रकार बोले—‘प्रभो! वृत्रासुरका वध करो’ ।। ३२-३३ ।।
महेश्वर उवाच
एष वृत्रो महान् शक्र बलेन महता वृतः । विश्वात्मा सर्वगश्चैव बहुमायश्च विश्रुतः ।। ३४ ।। **महेश्वर बोले—**इन्द्र! यह महान् वृत्रासुर बड़ी भारी सेनासे घिरा हुआ तुम्हारे सामने खड़ा है। ज्ञाननिष्ठ होनेके कारण यह सम्पूर्ण विश्वका आत्मा है। इसमें सर्वत्र गमन करनेकी शक्ति है। यह अनेक प्रकारकी मायाओंका सुविख्यात ज्ञाता भी है ।। ३४ ।। तदेनमसुरश्रेष्ठं त्रैलोक्येनापि दुर्जयम् । जहि त्वं योगमास्थाय मावमंस्थाः सुरेश्वर ।। ३५ ।। सुरेश्वर! यह श्रेष्ठ असुर तीनों लोकोंके लिये भी दुर्जय है। तुम योगका आश्रय लेकर इसका वध करो। इसकी अवहेलना न करो ।। ३५ ।। अनेन हि तपस्तप्तं बलार्थममराधिप । षष्टिं वर्षसहस्राणि ब्रह्मा चास्मै वरं ददौ ।। ३६ ।। अमरेश्वर! इस वृत्रासुरने बलकी प्राप्तिके लिये ही साठ हजार वर्षोंतक तप किया था और तब ब्रह्माजीने इसे मनोवाञ्छित वर दिया था ।। ३६ ।।