महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहत्त्वं योगिनां चैव महामायत्वमेव च ।
महाबलत्वं च तथा तेजश्चाग्र्यं सुरेश्वर ।। ३७ ।।
सुरेन्द्र! उन्होंने इसे योगियोंकी महिमा, महा-मायावीपन, महान् बल-पराक्रम तथा सर्वश्रेष्ठ तेज प्रदान किया है ।। ३७ ।।
एतत् त्वां मामकं तेजः समाविशति वासव ।
व्यग्रमेनं त्वमप्येनं वज्रेण जहि दानवम् ।। ३८ ।।
वासव! लो, यह मेरा तेज तुम्हारे शरीरमें प्रवेश करता है। इस समय दानव वृत्र ज्वरके कारण बहुत व्यग्र हो रहा है; इसी अवस्थामें तुम वज्रसे इसे मार डालो ।। ३८ ।।
शक्र उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादेन दितिजं सुदुरासदम् ।
वज्रेण निहनिष्यामि पश्यतस्ते सुरर्षभ ।। ३९ ।।
इन्द्रने कहा—भगवन्! सुरश्रेष्ठ! आपकी कृपासे इस दुर्धर्ष दैत्यको मैं आपके देखते-देखते वज्रसे मार डालूँगा ।।
भीष्म उवाच
आविश्यमाने दैत्ये तु ज्वरेणाथ महासुरे ।
देवतानामृषीणां च हर्षान्नादो महानभूत् ।। ४० ।।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! जब महादैत्य वृत्रासुरके शरीरमें ज्वरने प्रवेश किया, तब देवता और ऋषियोंका महान् हर्षनाद वहाँ गूँज उठा ।। ४० ।।
ततो दुन्दुभयश्चैव शङ्खाश्च सुमहास्वनाः ।
मुरजा डिण्डिमाश्चैव प्रावाद्यन्त सहस्रशः ।। ४१ ।।
फिर तो दुन्दुभियाँ, जोर-जोरसे बजनेवाले शंख, ढोल और नगाड़े आदि सहस्रों बाजे बजाये जाने लगे ।।
असुराणां तु सर्वेषां स्मृतिलोपो महानभूत् ।
मायानाशश्च बलवान् क्षणेन समपद्यत ।। ४२ ।।
समस्त असुरोंकी स्मरण-शक्तिका बड़ा भारी लोप हो गया। क्षणभरमें उनकी सारी मायाओंका पूर्णरूपसे विनाश हो गया ।। ४२ ।।
तथाविष्टमथो ज्ञात्वा ऋषयो देवतास्तथा ।
स्तुवन्तः शक्रमीशानं तथा प्राचोदयन्नपि ।। ४३ ।।
इस प्रकार वृत्रासुरमें महादेवजीके ज्वरका आवेश हुआ जान देवता और ऋषि देवेश्वर इन्द्रकी स्तुति करते हुए उन्हें वृत्रवधके लिये प्रेरणा देने लगे ।। ४३ ।।
रथस्थस्य हि शक्रस्य युद्धकाले महात्मनः ।
ऋषिभिः स्तूयमानस्य रूपमासीत् सुदुर्दर्शम् ।। ४४ ।।