भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1839

शैलराजसुता चास्य नित्यं पार्श्वे स्थिता बभौ ॥ ७ ॥
सुवर्णमय धातुसे विभूषित उस पर्वतशिखरके तटपर बैठे हुए महादेवजी उसी प्रकार अपूर्व शोभा पाते थे मानो किसी सुन्दर पर्यङ्कपर बैठे हों। वहीं प्रतिदिन उनके वामपार्श्वमें रहकर गिरिराजनन्दिनी भगवती पार्वती भी अनुपम शोभा पाती थीं ॥ ६-७ ॥
तथा देवा महात्मानो वसवश्चामितौजसः ।
तथैव च महात्मानावश्विनौ भिषजां वरौ ।
तथा वैश्रवणो राजा गुह्यकैरभिसंवृतः ॥ ८ ॥
यक्षाणामीश्वरः श्रीमान् कैलासनिलयः प्रभुः ।
(शङ्खपद्मनिधिभ्यां च ऋद्ध्या परमया सह ।)
उपासन्त महात्मानमुशना च महामुनिः ॥ ९ ॥
इसी प्रकार वहाँ बहुत-से महामनस्वी देवता, अमित तेजस्वी वसुगण, चिकित्सकोंमें श्रेष्ठ महामना अश्विनीकुमार, शंखनिधि, पद्मनिधि तथा उत्तम ऋद्धिके साथ गुह्यकोंसे घिरे हुए कैलासवासी यक्षपति प्रभुतासम्पन्न श्रीमान् राजा कुबेर तथा महामुनि शुक्राचार्य—ये सभी परमात्मा महादेवजीकी उपासना किया करते थे ॥ ८-९ ॥
सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव च महर्षयः ।
अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा देवर्षयोऽपरे ॥ १० ॥
विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा नारदपर्वतौ ।
अप्सरोगणसंघाश्च समाजग्मुरनेकणः ॥ ११ ॥
सनत्कुमार आदि महर्षि, अंगिरा आदि तथा अन्य देवर्षि, विश्वावसु गन्धर्व, नारद, पर्वत और अप्सराओंके अनेक समुदाय उस पर्वतपर महादेवजीकी आराधनाके लिये आया करते थे ॥ १०-११ ॥
ववौ सुखः शिवो वायुर्नानागन्धवहः शुचिः ।
सर्वर्तुकुसुमोपेताः पुष्पवन्तो द्रुमास्तथा ॥ १२ ॥
वहाँ नाना प्रकारकी सुगन्धको फैलानेवाली, पवित्र, सुखद एवं मंगलमयी वायु चलती रहती थी। सभी ऋतुओंके फूलोंसे सुशोभित होनेवाले खिले हुए वृक्ष उस शिखरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १२ ॥
तथा विद्याधराश्चैव सिद्धाश्चैव तपोधनाः ।
महादेवं पशुपतिं पर्युपासन्त भारत ॥ १३ ॥
भारत! तपस्याके धनी सिद्ध और विद्याधर भी वहाँ पशुपति महादेवजीकी उपासनामें तत्पर रहते थे ॥
भूतानि च महाराज नानारूपधराण्यथ ।
राक्षसाश्च महारौद्राः पिशाचाश्च महाबलाः ॥ १४ ॥
बहुरूपधरा हृष्टा नानाप्रहरणोद्यताः ।