भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2225

शुक उवाच

दृष्टो मार्गः प्रवृत्तोऽस्मि स्वस्ति तेऽस्तु तपोधन । त्वत्प्रसादाद् गमिष्यामि गतिमिष्टां महाद्युते ॥ ८ ॥ शुकदेव बोले— महातेजस्वी तपोधन! आपका कल्याण हो। अब मुझे मोक्षमार्गका दर्शन हो गया। मैं वहाँ जानेको तैयार हूँ। आपकी कृपासे मैं अभीष्ट गति प्राप्त करूँगा ॥ ८ ॥ नारदेनाभ्यनुज्ञातः शुको द्वैपायनात्मजः । अभिवाद्य पुनर्योगमास्थायाकाशमाविशत् ॥ ९ ॥ कैलासपृष्ठादुत्पत्य स पपात दिवं तदा । अन्तरिक्षचरः श्रीमान् वायुभूतः सुनिश्चितः ॥ १० ॥ नारदजीकी आज्ञा पाकर व्यासकुमार शुकदेवजी उन्हें प्रणाम करके पुनः योगमें स्थित हो आकाशमें प्रविष्ट हुए। कैलासशिखरसे उछलकर वे तत्काल आकाशमें जा पहुँचे और सुनिश्चित ज्ञान पाकर वायुका रूप धारण करके श्रीमान् शुकदेव अन्तरिक्षमें विचरने लगे ॥ ९-१० ॥ तमुद्यन्तं द्विजश्रेष्ठं वैनतेयसमद्युतिम् । ददृशुः सर्वभूतानि मनोमारुतरंहसम् ॥ ११ ॥ उस समय समस्त प्राणियोंने ऊपर जाते हुए द्विजश्रेष्ठ शुकदेवको विनतानन्दन गरुड़के समान कान्तिमान् तथा मन और वायुके समान वेगशाली देखा ॥ ११ ॥ व्यवसायेन लोकांस्त्रीन् सर्वान् सोऽथ विचिन्तयन् । आस्थितो दीर्घमध्वानं पावकार्कसमप्रभः ॥ १२ ॥ वे निश्चयात्मक बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण त्रिलोकीको आत्मभावसे देखते हुए बहुत दूरतक आगे बढ़ गये। उस समय उनका तेज सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ १२ ॥ तमेकमनसं यान्तमव्यग्रमकुतोभयम् । ददृशुः सर्वभूतानि जङ्गमानि चराणि च ॥ १३ ॥ यथाशक्ति यथान्यायं पूजां वै चक्रिरे तदा । पुष्पवर्षैश्च दिव्यैस्तमवचक्रुर्दिवौकसः ॥ १४ ॥ उन्हें निर्भय होकर शान्त और एकाग्रचित्तसे ऊपर जाते समय समस्त चराचर प्राणियोंने देखा और अपनी शक्ति तथा रीतिके अनुसार उनका यथोचित पूजन किया। देवताओंने उनपर दिव्य फूलोंकी वर्षा की ॥ १३-१४ ॥ तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे गन्धर्वाप्सरसां गणाः । ऋषयश्चैव संसिद्धाः परं विस्मयमागताः ॥ १५ ॥