भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2226

उन्हें इस प्रकार जाते देख समस्त गन्धर्व, अप्सराओंके समुदाय तथा सिद्ध ऋषि-मुनि महान् आश्चर्यमें पड़ गये ।। अन्तरिक्षगतः कोऽयं तपसा सिद्धिमागतः । अधःकायोर्ध्ववक्त्रश्च नेत्रैः समभिरज्यते ।। १६ ।। और आपसमें कहने लगे—'तपस्यासे सिद्धिको प्राप्त हुआ यह कौन महात्मा आकाशमार्गसे जा रहा है, जिसका मुख-मण्डल ऊपरकी ओर और शरीरका निचला भाग नीचेकी ओर ही है? हमारी आँखें बरबस इसकी ओर खिंच जाती हैं' ।। १६ ।। ततः परमधर्मात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । भास्करं समुदीक्षन् स प्राङ्मुखो वाग्यतोऽगमत् ।। १७ ।। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध परम धर्मात्मा शुकदेवजी पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके सूर्यको देखते हुए मौनभावसे आगे बढ़ रहे थे ।। १७ ।। शब्देनाकाशमखिलं पूरयन्निव सर्वशः । तमापतन्तं सहसा दृष्ट्वा सर्वाप्सरोगणाः ।। १८ ।। सम्भ्रान्तमनसो राजन्नासन् परमविस्मिताः । वे अपने शब्दसे सम्पूर्ण आकाशको पूर्ण-सा कर रहे थे। राजन्! उन्हें सहसा आते देख सम्पूर्ण अप्सराएँ मन ही-मन घबरा उठीं और अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गयीं ।। १८ ½ ।। पञ्चचूड़ाप्रभृतयो भृशमुत्फुल्ललोचनाः ।। १९ ।। दैवतं कतमं ह्येतदुत्तमां गतिमास्थितम् । सुनिश्चितमिहायाति विमुक्तमिव निःस्पृहम् ।। २० ।। पञ्चचूड़ा आदि अप्सराओंके नेत्र विस्मयसे अत्यन्त खिल उठे थे। वे परस्पर कहने लगीं कि उत्तम गतिका आश्रय लेकर यह कौन-सा देवता यहाँ आ रहा है? इसका निश्चय अत्यन्त दृढ़ है। यह सब प्रकारके बन्धनों तथा संशयोंसे मुक्त-सा हो गया है और इसके भीतर किसी वस्तुकी कामना नहीं रह गयी है ।। ततः समभिचक्राम मलयं नाम पर्वतम् । उर्वशी पूर्वचित्तिश्च यं नित्यमुपसेवतः ।। २१ ।। कुछ ही देरमें वे मलय नामक पर्वतपर जा पहुँचे, जहाँ उर्वशी और पूर्वचित्ति—ये दो अप्सराएँ सदा निवास करती हैं ।। २१ ।। तस्य ब्रह्मर्षिपुत्रस्य विस्मयं ययतुः परम् । अहो बुद्धिसमाधानं वेदाभ्यासरते द्विजे ।। २२ ।। अचिरेणैव कालेन नभश्चरति चन्द्रवत् । पितृशुश्रूषया बुद्धिं सम्प्राप्तोऽयमनुत्तमाम् ।। २३ ।। ब्रह्मर्षि व्यासजीके पुत्रकी यह उत्तम गति देख उन दोनोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे आपसमें कहने लगीं, 'अहो! इस वेदाभ्यासपरायण ब्राह्मणकी बुद्धिमें कितनी अद्भुत