महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2235, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
बदरिकाश्रममें नारदजीके पूछनेपर भगवान् नारायणका परमदेव परमात्माको ही सर्वश्रेष्ठ पूजनीय बताना
युधिष्ठिर उवाच
गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः ।
य इच्छेत् सिद्धिमास्थातुं देवतां कां यजेत सः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी जो भी सिद्धि पाना चाहे, वह किस देवताका पूजन करे? ॥ १ ॥
कुतो ह्यस्य ध्रुवः स्वर्गः कुतो नैःश्रेयसं परम् ।
विधिना केन जुहुयाद् दैवं पित्र्यं तथैव च ॥ २ ॥
मनुष्यको अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? उसे परम कल्याण किस साधनसे सुलभ हो सकता है? वह किस विधिसे देवताओं तथा पितरोंके उद्देश्यसे होम करे? ॥ २ ॥
मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः ।
स्वर्गतश्चैव किं कुर्याद् येन न च्यवते दिवः ॥ ३ ॥
मुक्त पुरुष किस गतिको प्राप्त होता है? मोक्षका क्या स्वरूप है? स्वर्गमें गये हुए मनुष्यको क्या करना चाहिये, जिससे वह स्वर्गसे नीचे न गिरे? ॥ ३ ॥
देवतानां च को देवः पितॄणां च पिता तथा ।
तस्मात् परतरं यच्च तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ४ ॥
देवताओंका भी देवता और पितरोंका भी पिता कौन है? अथवा उससे भी श्रेष्ठ तत्त्व क्या है? पितामह! इन सब बातोंको आप मुझे बताइये ॥ ४ ॥
भीष्म उवाच
गूढं मां प्रश्नवित् प्रश्नं पृच्छसे त्वमिहानघ ।
न ह्येतत् तर्कया शक्यं वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ ५ ॥
ऋते देवप्रसादाद् वा राजन् ज्ञानागमेन वा ।
गहनं ह्येतदाख्यानं व्याख्यातव्यं तवारिहन् ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**निष्पाप युधिष्ठिर! तुम प्रश्न करना खूब जानते हो। इस समय तुमने मुझसे बड़ा गूढ़ प्रश्न किया है। राजन्! भगवान्की कृपा अथवा ज्ञानप्रधान शास्त्रके बिना केवल तर्कके द्वारा सैकड़ों वर्षोंमें भी इन प्रश्नोंका उत्तर नहीं दिया जा सकता। शत्रुसूदन!